Thursday, July 9, 2026 |
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चिंतामणि पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर एक आध्यात्मिक, धार्मिक व सामाजिक स्थल

by Business Remedies
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बिजनेस रेमेडीज़/जयपुर। गुलाबी नगरी के नाम से विश्व विख्यात जयपुर नगरी अपनी स्थापना से ही धार्मिक नगरी के रूप में विख्यात रही है और जैन धर्म के अति प्राचीन मंदिरों के लिए विख्यात है। शहर के विकास के साथ-साथ बाहर बनने वाली विभिन्न कॉलोनियों में भी अनेकों जैन मंदिर बन रहे है उनमें से एक मंदिर 1008 श्री चिंतामणि पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर है, जहां पर 300 वर्ष से भी अधिक प्राचीन, मनोहारी छवि युक्त मूलनायक भगवान श्री पाश्र्वनाथ विराजमान है। मन्दिरजी में मूल वेदी के अलावा कई अन्य वेदियां भी है, जहां पर विभिन्न तीर्थंकरों की व जैन परम्परा की विभिन्न देवियों की प्रतिमा भी विराजमान है। मंदिर का नक्शा मुनि पुगंव 108 श्री सुधा सागर जी मुनिराज के कुशल निर्देशन में और परम गुरुभक्त एवं श्रमण संस्कृति संस्थान में तत्कालीन उप-अधिष्ठाता पद पर कार्यरत राजमल बेगस्या सा. जो सामाजिक व धार्मिक क्षेत्रों में बहुत ही सक्रिय थे, की देख-रेख में बापू नगर जयपुर निवासी प्रसिद्ध वास्तुविद एच. के. शर्मा के द्वारा बनाया गया था।
जिनालय निर्माण हेतु भूमि पूजन दिनांक 22 अगस्त, 2010 को मुनिपुगंव 108 सुधासागरजी के पावन आशीर्वाद से बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया के सानिध्य में किया गया था। तत्पश्चात बालाचार्य 108 श्री सिद्धसेन मुनिराज के सानिध्य में 15 नवम्बर 2013 से 17 नवम्बर 2013 तक मूलनायक 300 वर्ष से अधिक प्राचीन 1008 श्री पाश्र्वनाथ भगवान की काले पाषाण की प्रतिमा को मूलवेदी में विराजमान करने हेतु वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव का आयोजन प्रतिष्ठाचार्य निर्मल बोहरा के कुशल निर्देशन में सम्पन्न करवाया गया था और पूज्य बालाचार्य जी के सानिध्य में ही प्रथम वार्षिकोत्सव भी लगभग 1800 ज्यादा समाज जनो की उपस्थिति में भव्यता पूर्वक मनाया गया था।
इस पावन मन्दिर में समय-समय पर विभिन्न मुनिराज का प्रवास होता रहा है उनमें से प्रमुख रूप से उल्लेखनीय संतो में 108 श्री विश्रांत सागर मुनिराज, आचार्य 108 श्री वसुनंदी ससंघ कुल 15 पिच्छी सहित ने दो-दो दिन प्रवास किया। इसके अलावा आचार्य 108 श्री विराग सागर की शिष्या 105 विशाश्री माताजी कुल 11 पिच्छी सहित तीन बार प्रवास कर चुकी है। मन्दिर में मुनि 108 विभंजन सागरजी, मुनि 108 विश्वासागर गणिनी आर्यिका 105 विज्ञाश्री माताजी का भी इस क्षेत्र पर एक-एक दिन का प्रवास रहा है।
पारस विहार क्षेत्र के लिए सबसे ज्यादा उल्लेखनीय बात ये रही कि इस पावन भूमि, अतिशय युक्त मन्दिर में महामना, महातपस्वी, महर्षि आचार्य 108 कुशाग्र नंदीजी गुरुदेव ने लगातार दो वर्षायोग चातुर्मास 2019 एवं 2020 में किया। वर्ष 2019 तो कोविड काल था, लेकिन गुरुदेव के आशीर्वाद और आसपास के श्रद्धालुजनों की भक्ति से कोविड काल में भी बहुत धर्म प्रभावना हुई। पूज्य गुरुदेव का वर्ष 2021 का वर्षायोग स्थापना यद्यपि जयपुर कीर्ति नगर में हुआ था, लेकिन गुरुदेव का आशीर्वाद यहां की समाज को निरंतर मिलता रहा और कोविड काल व उसके बाद की विपरीत स्थितियों की वजह से पूज्य आचार्य कुशाग्र नंदी का दोनों वर्षायागों के समय पारस विहार जैन मंदिर में लगभग 27 माह का र्निविघ्न्न प्रवास रहा।
पूज्य मुनिराजों के प्रवास की ये परम्परा नियमित रूप से चली आ रही है। इसी परंपरा में परम पूज्य आचार्य 108 विमल सागर मुनिराज के अंतिम दीक्षित शिष्य पूज्य उपाध्याय 108 ऊर्जयंत सागर मुनिराज का 45 दिन का प्रवास भी इस पावन क्षेत्र पर रहा और उनके ही पावन सानिध्य में वर्ष 2023 की फाल्गुन माह की अष्ठहानिका के पावन अवसर पर श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान प्रतिष्ठाचार्य सुरेन्द सल्मबूर, उदयपुर वालों के निर्देशन में बड़े ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ सानंद सम्पन्न हुआ था।
पुण्य योग से गुरुजनों के पधारने और प्रवास की कड़ी निरन्तर चलती आ रही है। वर्ष 2023 में पूज्य गणिनी आर्यिका 105 श्री भरतेश्वरमति माताजी ससंघ प्रताप नगर, जयपुर से चातुर्मास के उपरांत नेवटा के लिए विहार करते हुए तीन दिन का मंदिर में प्रवास रहा।
इसके बाद वर्ष 2024 का कीर्ति नगर जयपुर में वर्षायोग करने के उपरांत गणाचार्य 108 विशुद्ध सागर मुनिराज के परम शिष्य 108 समत्व सागर मुनिराज ससंघ का इन्दौर, मध्यप्रदेश के लिए विहार करते हुए मंदिर में मंगल प्रवेश हुआ। मुनि संघ के मंदिर में दर्शन करते हुए और समाज के पुण्य योग से पूज्य मुनि संघ ने अष्टधातु की श्री आदिनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान कराने की भावना व्यक्त की और तत्काल ही स्थानीय सोगाणी परिवार ने मुनि समत्व सागर मुनिराज से शुभ मुहूर्त पूछ कर बह्मचारी भैया ऋषभ सोगाणी के निर्देशन में विधिपूर्वक मूल वेदी मे 1008 श्री आदिनाथ भगवान की प्रतिमाजी विराजमान की गई।
प्रतिदिन की धार्मिक क्रियाओं में मंदिर में नित्य नियम की पूजा-विधान की सुव्यवस्थित व्यवस्था रहती है। जिसमें प्रात: 7:15 बजे अभिषेक, 7:30 बजे शान्तिधारा एवं तत्पश्चात नित्य पूजा होती है और सायंकाल 7:15 बजे आरती, शास्त्र सभा होती रहती है। ये समस्त क्रियाएं स्थानीय व बाहर से आये साधर्मी बंधु ही सम्पन्न करते हैं। विशेष अवसरों पर होने वाले कार्यक्रमों में विशेष कार्यक्रमों में तो यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है और वातावरण मंगलमय हो उठता है।
मन्दिर का इतिहास और स्थापना की प्रेरणा: लगभग 5 दशक पूर्व 1971 में सांगानेर के चतुर्थ कालीन संघी जी आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, के गर्भगृह में भूगर्भ चैत्यालय से आचार्य देशभूषण महाराज ससंघ के सानिध्य में श्री जी को आमजनों के दर्शनार्थ मंदिर में बाहर लाने का सौभाग्य परिवार के वरिष्ठ कुन्दन मल गोदिका को मिला था। उस समय अचानक ही कुछ भावना बनी और तभी से समस्त गोदिका परिवार ने मन्दिर बनाने का संकल्प लिया, जो उनके पुत्र पवन कुमार ने उनके ही दिए गए धार्मिक संस्कारो के बलबूते मंदिर निर्माण कराने का विचार किया। सन् 1971 में देश भूषण गुरुदेव ससंघ के सानिध्य में आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, सागांनेर के भुगभ से कुन्दनमल गोदिका, स्वयं के मस्तिष्क के ऊपर रखकर बाहर लाये थे, उसके बाद मदिर में विरजमान किया गया।
स्व. कुंदनमल गोदिका के आशीर्वाद और पुत्र पवन गोदिका के दृढ़ निश्चय और स्थानीय समाज की एकजुटता का परिणाम है कि आज यह मंदिर जैन समाज के लिए एक आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
आज यह मन्दिर एशिया महाद्वीप की जयपुर स्थित सबसे बड़ी कॉलोनी मानसरोवर के निकट स्थित है, न केवल जयपुर, बल्कि पूरे राजस्थान और अन्य स्थानों जैसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली, इलाहाबाद, उदयपुर, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है, जो सभी को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।



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