आखिरकार दबाव के कारण केन्द्र सरकार ने लेटरल एंट्री स्कीम को वापिस ले ही लिया। इसका मतलब यह हुआ कि सरकारी उच्च पदों पर अब पर्दे के पीछे से सीधी भर्ती नहीं होगी। संघ लोक सेवा आयोग की ओर से प्रत्येक वर्ष आईएएस पदों पर अफसरों की भर्ती कठिन परीक्षा प्रणाली के माध्यम से की जाती है जिसके लिए देश के लाखों मेधावी छात्र-छात्राएं अपना भाग्य आजमाते हैं परन्तु केन्द्र सरकार ने यह फैसला किया है कि ऐसे अफसर पदों के लिए पर्दे के पीछे से सीधे प्रवेश कुछ लोगों को विशेषज्ञता के नाम पर दिया जा सकता है। इस बार हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग ने ऐसे 45 पदों के लिए सीधे आवेदन आमंत्रित कर दिए थे। पर दबाव के चलते उसे यह फैसला वापस लेना पड़ा। देश का पूरा विपक्ष खासकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी व कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ऐसी भर्ती का सख्त विरोध कर इसे अनुसूचित जाति व जनजाति व पिछड़े वर्ग के अधिकारों पर ‘डाका’ तक बता रहे थे। इसकी वजह यह है कि इन भर्तियों में किसी प्रकार का आरक्षण नहीं होगा और विशेषज्ञता के नाम पर किसी भी व्यक्ति को सीधे किसी भी सरकारी विभाग में निदेशक से लेकर संयुक्त सचिव तक बनाया जा सकता है। इससे यह भी प्रश्न पैदा हो रहा है कि क्या प्रशासन के उच्च पदों पर भी ठेका प्रथा को बढ़ावा नहीं मिलेगा? पिछले पांच सालों में सरकार पर्दे के पीछे से 60 के लगभग अफसरों की भर्ती कर चुकी है। इन सभी भर्तियों में एक भी व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति का नहीं था। यह हकीकत है कि केन्द्र सरकार की नौकरियों में तीसरे, दूसरे व प्रथम दर्जे के 50 प्रतिशत से अधिक पद अनुसूचित जाति व जनजाति व पिछड़े वर्गों के खाली पड़े हुए हैं। बाद में ये पद योग्य उम्मीदवार न होने का बहाना देकर सामान्य वर्ग से भर लिए जाते हैं। सवाल यह है कि सरकार को लेटरल एंट्री की जरूरत क्यों होती है जबकि हर साल यह सैकड़ों की संख्या में आईएएस अफसरों की भर्ती करती है। वास्तव में इसका सुझाव 2005 में प्रशासनिक सुधार आयोग ने दिया था। भाजपा सरकार लेटरल एंट्री के लिए इस आयोग की रिपोर्ट का सहारा ले रही है। मगर इस मामले ने तूल पकड़ लिया है। सवाल यह भी है कि जब वर्ष,2005 में प्रशासनिक सुधार आयोग बना था तो परिस्थितियां कुछ और थीं और अब वर्ष, 2024 चल रहा है जिसमें परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। अत: मोदी सरकार ने अपना फैसला समय के अनुसार वापिस लेकर उचित कदम उठाया है।

