बिजनेस रेमेडीज़/जयपुर। तिलक नगर के सूर्य मार्ग स्थित सामुदायिक भवन मंडपम् में चातुर्मास के 14 वें दिन गुरुवार को प्रवचन में जैनाचार्य श्री विजयराज म.सा. ने मंगलाचरण के बाद भगवान महावीर के उत्तराध्ययन सूत्र के 31 वें अध्याय की दूसरी गाथा पर विवेचना करते हुए प्राणातिपात, मृषावाद पाप के बाद अदत्तादान पाप पर कहा कि जीवन में सांसारिक लोगों को असंयम से निवृति और संयम में प्रवृति लेनी चाहिए। संयम की प्रवृति से मस्ती बढ़ जाती है, जबकि बिना संयम के मस्ती नहीं होती है। संयम से रिश्ते जुड़ते हैं, वह मस्ती से जीता है। उन्होंने अदत्तादान पाप पर कहा कि लोभ की पूर्ति होने पर व्यक्ति में अहंकार आ जाता है और इसकी पूर्ति नहीं होने पर आवेश आता है। इसलिए व्यक्ति को लोभ से बचना चाहिए। लोभी व्यक्ति कई तरह के प्रपंच करता है यानि छल, कपट से दूसरे के माल को हड़पना चाहता है। व्यक्ति को इससे बचना चाहिए। मन का स्वभाव अतृप्ति है, इसकी पूर्ति के लिए मानव लोभ में चला जाता है। लोभी व्यक्ति को कितना भी धन मिल जाए, उसे वह कम ही नजर आता है, जैसे अभिमानी की कितनी भी प्रशंसा कर लो, उसे वह कम ही नजर आती है। लोभी व्यक्ति में पहले तृष्णा, मोह और फिर दुख पैदा होता है।
आचार्य श्री ने इसके लिए राजगिरी के पूनिया श्रावक और ममण सेठ का जिक्र करते हुए कहा कि मानव को पूनिया श्रावक की तरह बनकर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मन के स्वभाव अतृप्ति को संतोष के जरिए पूरा (तृप्त) किया जा सकता है। शुद्ध कौन और प्रबुद्ध कौन है? पर आचार्य श्री ने कहा कि जो पाप को समाप्त करता है, वह शुद्ध तथा जो पाप को शांत करे वह प्रबुद्ध है। शांति चाहते हैं तो संतोष धारण करना होगा। अगर जीवन में संतोष आ जाएगा, तो जीने के रंग और ढंग बदल जाएगा, आनंद की प्राप्ति होगी। चोरी के पाप से दूर हो जाएगा। किसी का दिया हुआ पाप नहीं है,जबरन छीना हुआ पाप है। उन्होंने कहा कि विवेक में धर्म है। अविवेक में पाप है। इसलिए व्यक्ति को विवेक से जीना चाहिए। सुख का मूल धर्म है। धर्म का मूल दया और दया का मूल विवेक है। विवेक से किया हुआ काम धार्मिक ही होगा। अविवेक से किया धर्म, पाप बन जाता है। व्यक्ति को हमेशा विवेक का भाव जागृत रखना चाहिए। विवेक ही सही और गलत की पहचान कर सकता है। इसी में नैतिकता, प्रमाणिकता और ईमानदारी का समावेश रहता है। श्रद्धा और रूचि के साथ किया काम प्रशस्त होगा। आचार्य श्री ने भजन ‘जिंदगी में हजारों से मेला जुड़ा… ‘हंस जब जब भी उड़ा वो अकेला उड़ा…’ ठाठ सारे के सारे पड़े के पड़े रह गए… सुनाकर प्रवचन मंडपम् को भक्तिमय बना दिया। उन्होंने चातुर्मास के संबंध में कहा कि यह आत्मा को धोने (प्रक्षालन) के लिए है। आचार्य श्री के प्रवचन से पूर्व संत श्री विनोद मुनि म.सा. ने जैन दर्शन के विभिन्न आयामों पर प्रवचन दिए। आचार्य श्री के प्रवचन के बाद विदूषी महासती श्री नेहा श्री म.सा. ने प्रवचनों से संबंधित चार प्रश्न पूछे, जिसके श्रावक-श्राविकाओं ने जवाब दिए। प्रत्याख्यानों की श्रृंखला में बियासन, एकासन, आयम्बिल, नीवीं, उपवास, बेले, तेलें आदि प्रत्याख्यानों के साथ श्राविका नीतू ढाबरिया के गुरुवार को 35 वां उपवास तथा पुखराज कोठारी के 16 वां उपवास गतिमान है। नवरतनमल लूंकड़ के 30 उपवास के अग्रिम प्रत्याख्यान से 21 वां उपवास गतिमान है। एकासना, आयम्बिल, उपवास और तेले की लड़ी भी निरंतर जारी है। श्रावक-श्राविकाओं सहित चारित्र आत्माओं की अन्य गुप्त तपस्याएं भी जारी है। धर्मसभा के अंत में संघ के महामंत्री नवीन लोढ़ा ने आचार्य भगवन् के सानिध्य का अधिकतम लाभ लेने के लिए जनसमूह को निवेदन किया एवं आह्वान किया कि जो लाभ नहीं ले पा रहे उनको प्रेरणा करें कि वो इस सौभाग्य से वंचित ना रहे। नवकार भवन में प्रात: 6 से 6.50 बजे स्वयं जैनाचार्य क्लास लेकर नैतिक, व्यवहारिक एवं धार्मिक जीवन जीने की कला सिखा रहे हैं। प्रात: 8.45 से 10.15 बजे प्रवचन के माध्यम से जिनवाणी करते हैं। दोपहर में 3.15 बजे महामंगलकारी मंगलपाठ होता है। महामंत्री नवीन लोढ़ा ने बताया कि आचार्य श्री विजयराज महाराज म.सा. के सानिध्य में 25 जुलाई को नीतू ढाबरिया के तपस्या की पूर्णाहुति के उपलक्ष्य में सामूहिक एकासन व मरुधरा सिंहिनी महासती नानू कंवर म.सा. की पुण्य स्मृति में 27 जुलाई को सुबह 9.30 से दोपहर 2 बजे तक नेत्र चिकित्सा एवं लैंस प्रत्यारोपण, स्वास्थ्य चिकित्सा एवं तम्बाकू मुक्ति शिविर, कैंसर जांच जागरुकता शिविर और ब्लड डोनेशन शिविर तथा सामूहिक निवी का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। धर्मसभा में कोलकाता, मुम्बई, इन्दौर, भोपाल, चित्तौड़, राजनांदगांव, उदयपुर, बीकानेर, ब्यावर, भीलवाड़ा, मंदसौर, नागौर से अनेक श्रद्धालु उपस्थित थे।

