जैन धर्म में क्षमायाचना का बहुत महत्व है, जैन धर्म में क्षमा को आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। “क्षमा वीरस्य भूषणम्” अर्थात् क्षमा वीरों का आभूषण है। यह केवल एक धार्मिक या दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की व्यावहारिक कला भी है। सामान्य धारणा है कि क्षमा करना कमजोरी का संकेत है, परंतु वास्तविकता इसके विपरीत है। क्षमा करने की क्षमता उसी में होती है जो मानसिक रूप से मजबूत और आत्मिक रूप से परिपक्व हो। जो व्यक्ति अपमान या अन्याय सहकर भी संयमित रहता है और बदले की भावना से ऊपर उठकर क्षमा करता है, वही सच्चा वीर कहलाता है,समाज में अनेक प्रकार के मतभेद और संघर्ष उत्पन्न होते हैं। यदि हर विवाद का उत्तर प्रतिशोध से दिया जाए तो वैर-विरोध की श्रृंखला कभी समाप्त नहीं होगी, अतःजैन धर्म में क्षमा के महत्व को बताया गया है जिससे कि इस श्रंखला को कम किया जा सके क्षमा वह सेतु है जो टूटे हुए संबंधों को जोड़ता है और समाज को एक नई दिशा देता है। यह शांति, सौहार्द और सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करती है, अतः स्पष्ट है कि क्षमा किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी शक्ति है। यह वीरता का वास्तविक आभूषण है, जो इंसान को भीतर से महान और बाहर से आदरणीय बनाता है।

