वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक मुद्दे के रूप में उभर कर आया है। इससे भारत सहित पूरी दुनिया में बाढ़, सूखा, कृषि संकट एवं खाद्य सुरक्षा, बीमारियां, प्रवासन आदि का खतरा बढ़ा है। भारत का एक बड़ा तबका आज भी कृषि पर निर्भर है। जलवायु और मौसम की स्थितियों पर अधिक निर्भरता के कारण कृषि सबसे असुरक्षित क्षेत्रों में से एक है। कृषि पर अधिक निर्भरता भारत को जलवायु परिवर्तन के लिए अधिक संवेदनशील बनाती है। वर्ष, 2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार देश में मौसम की खराब स्थितियों के कारण वार्षिक रूप से यूएसडी 9-10 बिलियन का नुकसान होता है। यह देश में खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए एक प्रमुख चुनौती है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण विश्व कृषि इस सदी में गंभीर गिरावट का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान के उच्च अक्षांश की और खिसकने से निम्न अक्षांश प्रदेशों में कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भारत के जल स्रोत तथा भंडार तेजी से सिकुड़ रहे हैं, जिससे किसानों को परम्परागत सिंचाई के तरीके छोडक़र पानी की खपत कम करने वाले आधुनिक तरीके एवं फसल अपनानी होंगी। ग्लेशियर के पिघलने से कई बड़ी नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र में दीर्घावधिक रूप से कमी आ सकती है, जिससे कृषि एवं सिंचाई में जलाभाव से गुजरना पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रदूषण, भू-क्षरण और सूखा पडऩे से पृथ्वी के तीन चौथाई भूमि क्षेत्र की गुणवत्ता कम हो गई है। अधिक तापमान बढऩे से मक्का, ज्वार और धान आदि फसलों को नुकसान हो सकता है, क्योंकि अधिक तापमान के कारण इन फसलों में दाना नहीं बनता अथवा कम बनता है। इस प्रकार तापमान की वृद्धि इन फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेंगी। जलवायु परिवर्तन के कारण अप्रत्याशित मौसम और प्राकृतिक संकट भी उत्पन्न हुए हैं, जिनमें सूखा, महामारी, चक्रवात, भारी बारिश या बाढ़ आदि शामिल हैं।

