केंद्र सरकार ने गत दिनों ही कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ‘समुद्र मंथन’ योजना को मंजूरी दी है। पर इस योजना को क्रियान्वयन होने में कितना वक्त लगेगा? यह आने वाला समय ही बताएगा। यह योजना महत्वपूर्ण तो मानी जा रही है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह खोज के परिणामों पर निर्भर करेगी।
भारत अपनी तेल की जरूरतों का लगभग 88 फीसदी और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना रणनीतिक रूप से अहम है। गहरे समुद्र में बड़े भंडार मिलने की संभावना रहती है, लेकिन ड्रिलिंग बेहद महंगी और जोखिमपूर्ण होती है। सरकार का लक्ष्य बेहतर सर्वेक्षण, आधुनिक तकनीक और साझा बुनियादी ढांचे के जरिए निजी व वैश्विक निवेश आकर्षित करना है। केंद्र सरकार ने इस मेगा प्लान के तहत वित्त वर्ष 2030-31 तक कुल 84,084 करोड़ के बजट का प्रावधान किया है। जहां तक है समुद्र के अंदर भू-वैज्ञानिक सर्वे और गहरे पानी में ड्रिलिंग के जरिए इसके परिणाम मिलने में कई वर्षों का समय लगेगा। गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज एक तकनीकी रूप से कठिन और लंबी प्रक्रिया है। सिस्मिक डेटा जुटाने, 60 गहरे पानी के कुओं की ड्रिलिंग और बुनियादी ढांचे के विकास के बाद व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन और उचित परिणाम मिलने में 3 से 5 वर्ष या उससे अधिक का समय लग सकता है। वैसे इस योजना से राजस्थान को भी अप्रत्येक्ष रूप से फायदा होगा। गुजरात से गैस आने पर राजस्थान के पावर प्लांट, सीमेंट-सेरामिक उद्योग को सस्ती गैस मिलेगी। भिवाड़ी, कोटा, पाली के इंडस्ट्रियल एरिया को सीधा फायदा पहुंचने की उम्मीद है। पश्चिमी तट पर नए एलएनजी टर्मिनल से राजस्थान तक पाइपलाइन नेटवर्क बढ़ेगा। ओएनजीसी, रिलायंस, श्लम्बरगर जैसी कंपनियों को जयपुर, जोधपुर में इंजीनियरिंग, ड्रिलिंग इक्विपमेंट, पाइप बनाने का काम मिलेगा, इससे रोजगार और निवेश में बढ़ोतरी होने की पूरी संभावना है। बाड़मेर रिफाइनरी एचपीसीएल को कच्चा तेल सप्लाई में विविधता मिलेगी।

