देश के अधिकांश ऐतिहासिक और पुराने शहरों के संकरे इलाकों में आग लगने की घटनाएं अब केवल दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि सोई हुई प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता का परिणाम बन चुकी हैं। विडंबना यह है कि इन घनी बस्तियों और बाजारों में संचालित अधिकांश व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पास अग्निशमन विभाग के वैध लाइसेंस या एनओसी तक नहीं होते, फिर भी नियमों को ताक पर रखकर कारोबार धड़ल्ले से जारी रहता है। जयपुर के पुरोहित जी कटले का अग्निकांड और प्रशासनिक चूक हाल ही में जयपुर के परकोटे स्थित प्रसिद्ध पुरोहित जी के कटले में हुई भीषण आगजनी ने एक बार फिर सुरक्षा दावों की पोल खोल दी है। जयपुर नगर निगम के पास 45-50 बड़ी गाडिय़ां हैं, पर पुरोहित जी कटले जैसी जगह में वो घुस ही नहीं सकती। 7 घंटे तक जवानों को मुख्य सडक़ से लंबे पाइप डालने पड़े, पानी निजी टैंकरों से लाना पड़ा। 15 गाडिय़ां लगीं, पर संकरी गलियों में छोटी बाइक-माउंटेड फायर यूनिट और हाइड्रेंट ही नहीं हैं। इस घटना में प्रशासन की भारी चूक सामने आई है। लगभग चार करोड़ रुपए की लागत से तैयार किया गया अत्याधुनिक फायर फाइटिंग सिस्टम या तो कागजों तक सीमित रहा या तकनीकी खामियों और देखरेख के अभाव में नाकारा साबित हुआ। वहीं संकरे रास्तों पर भारी अतिक्रमण, दुकानों के बाहर तक फैला सामान और हाइड्रेंट प्रणालियों की समय पर टेस्टिंग ना होना जैसी गंभीर लापरवाहियों के कारण स्थिति विकराल हो गई। हालांकि आग सुबह के समय लगी, जिससे बड़ा जनहानि टल गई, परंतु व्यापारियों को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ा। देश के तंग बाजारों में आज भी आधुनिक और छोटी दमकल गाडिय़ों की भारी कमी है, जो संकरी गलियों के भीतर तक आसानी से पहुंच सकें। पारंपरिक बड़ी गाडिय़ां मुख्य मार्ग पर खड़ी रह जाती हैं और लंबी पाइपलाइनों के सहारे मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सरकार और स्थानीय निकायों को युद्ध स्तर पर कदम उठाने होंगे। सबसे पहले सभी पुराने बाजारों का कठोर फायर ऑडिट कराया जाए और बिना लाइसेंस चल रही दुकानों को सील किया जाए। इसके अलावा, बाजारों से अवैध अतिक्रमण को पूरी तरह हटाकर आपातकालीन मार्गों को चौड़ा किया जाना अनिवार्य है।

