भारत-ताइवान संबंध अब सतर्क व्यापारिक दायरे से आगे बढ़कर एक संरचित साझेदारी का रूप लेते जा रहे हैं। यह जानकारी 11 Feb date को जारी एक रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार दोनों पक्षों के बीच सहयोग अब प्रौद्योगिकी, श्रमिक आवाजाही और आपूर्ति शृंखला जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक फैल चुका है। नई दिल्ली से जारी इस विश्लेषण में कहा गया है कि भारत ने अपने औद्योगिक परिवर्तन में ताइवान को एक अहम भागीदार के रूप में स्थापित किया है। भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ और ताइवान की ‘न्यू साउथबाउंड नीति’ के बीच सामंजस्य बनाकर दोनों ने भू-राजनीतिक जोखिमों से जुड़ी आपूर्ति शृंखला की चुनौतियों को कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। अब भारत की ताइवान नीति केवल चीन के दृष्टिकोण से प्रभावित नहीं है, बल्कि तकनीकी सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला की मजबूती और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की रणनीतिक परिस्थितियों से भी निर्देशित हो रही है।
रिपोर्ट, जो ताइवान स्थित ‘चीन और एशिया अध्ययन संगठन’ द्वारा प्रकाशित की गई है, में कहा गया है कि पहले नई दिल्ली और ताइपे के बीच संबंध काफी संतुलित और सतर्क थे। भारत की क्षेत्रीय संवेदनशीलताओं और चीन से जुड़े मुद्दों के कारण यह जुड़ाव सीमित दायरे में रहता था। परंतु अब यह संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, श्रम सहयोग और उन्नत प्रौद्योगिकी तक विस्तारित हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ताइवान की तकनीकी दक्षता और भारत के विशाल बाजार का मेल क्षेत्रीय आर्थिक ढांचे को अधिक मजबूत बना सकता है। इससे चीन के प्रभुत्व वाली आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता कम करने में सहायता मिलेगी।
रिपोर्ट में जनवरी 2026 में ताइपे आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र तथा मिजोरम सरकार के बीच हुए ‘टैलेंटेड लेबर एग्रीमेंट’ का भी उल्लेख किया गया है। इसे दोनों पक्षों के बीच गहरे संरचनात्मक सहयोग का संकेत माना गया है। यह समझौता दर्शाता है कि साझेदारी केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि जमीनी स्तर पर लागू हो रही है। वर्ष 2024 में मुंबई में तीसरे ताइपे आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना को भी संतुलित और सोची-समझी पहल बताया गया है। भारत ने हमेशा यह कहा है कि ताइवान को लेकर उसकी नीति स्पष्ट और स्थिर रही है।
भारत और ताइवान के बीच विभिन्न संवाद तंत्र भी सक्रिय हैं, जिनका उद्देश्य संवेदनशील सुरक्षा सहयोग की सीमा को पार किए बिना रणनीतिक क्षेत्रों में सामान्य सहयोग को बढ़ावा देना है। इन संवादों में समुद्री शासन, साइबर सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला की मजबूती जैसे विषय शामिल हैं। हिंद-प्रशांत परिप्रेक्ष्य में यह सहयोग ताइवान को एक व्यावहारिक आर्थिक भागीदार के रूप में स्थापित करता है। गैर-संवेदनशील लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर क्षेत्रीय देश नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं, जिससे समुद्री क्षेत्र और उच्च प्रौद्योगिकी तंत्र सुरक्षित रह सकें।

