जयपुर | एजेंसी। वर्तमान समय में एमआरआई की आवश्यकता शरीर के अंदरूनी अंगों और ऊतकों (टिश्यू) की बहुत ही स्पष्ट और बारीक तस्वीरें प्राप्त करने के लिए की जा रही है। पिछले दिनों बिजनेस रेमेडीज की टीम ने आर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ.नवीन शर्मा से एमआरआई की महत्वता, प्रकार और आज के परीपेक्ष्य इसकी उपयोगिता को लेकर विशेष बातचीत की गई। उन्होंने बताया कि एमआरआई का पूरा नाम मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग है। यह एक आधुनिक और सुरक्षित जांच तकनीक है। इसमें एक्स-रे की तरह रेडिएशन का उपयोग नहीं होता, बल्कि शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र और रेडियो तरंगों का उपयोग किया जाता है। आर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ.नवीन शर्मा ने बताया कि एमआरआई मशीन शरीर में मौजूद पानी के अणुओं के साथ इंटरैक्ट करती है। जब शरीर को एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो ये अणु प्रतिक्रिया करते हैं और रेडियो वेव्स के माध्यम से संकेत देते हैं। इन्हीं संकेतों को कंप्यूटर इमेज में बदल देता है, जिससे डॉक्टर शरीर के अंदर की स्थिति को विस्तार से देख सकते हैं। एमआरआई आज के समय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भरोसेमंद जांच तकनीक है। घुटनों, कमर, ब्रेन या किसी भी सॉफ्ट टिश्यू की समस्या के लिए यह सबसे सटीक जानकारी प्रदान करती है। सही मशीन और योग्य रेडियोलॉजिस्ट के साथ कराई गई एमआरआई जांच से बीमारी का सही समय पर पता लगाकर बेहतर उपचार संभव है। कंधा हमारे शरीर का सबसे ज्यादा मूवमेंट करने वाला जोड़ है। इसी वजह से यह आसानी से अपनी जगह से निकल भी सकता है, जिसे शोल्डर डिस्लोकेशन (कंधा उतरना) कहा जाता है। कई बार यह समस्या बार-बार होने लगती है, जिसे “बार-बार होने वाला कंधे का विस्थापन” कहते हैं। डॉ. नवीन शर्मा ने बताया कि घुटनों और कमर की एमआरआई सबसे अधिक कराई जाती है, क्योंकि घुटनों में लिगामेंट, मेनिस्कस और कार्टिलेज की चोट का पता चलता है। कमर में स्लिप डिस्क, नसों का दबाव और स्पाइनल समस्याओं का सही आकलन होता है। दर्द के वास्तविक कारण को पहचानने में मदद मिलती है। इसी प्रकार कंधों के बार—बार उतरने की समस्या सामने आती है। डॉक्टर्स पेशेंट को एमआरआई की सलाह देते हैं।
कंधे की संरचना
कंधे का जोड़ एक बॉल और सॉकेट (कटोरी) की तरह होता है। बाजू की हड्डी का ऊपरी हिस्सा गेंद की तरह होता है। कंधे की हड्डी में एक सॉकेट (कटोरी) होती है, जिसे “त्रद्यद्गठ्ठशद्बस्र” कहते हैं। यह कटोरी का आकार थोड़ा उथला और घड़ी (क्लॉक) जैसा गोल होता है। यही कारण है कि कंधा बहुत आसानी से घूम सकता है, लेकिन इसी वजह से यह अस्थिर भी होता है।
हिल-सेक्स क्या होता है?
जब कंधा उतरता है, तो बाजू की हड्डी कंधे की कटोरी से टकराती है, जिससे हड्डी पर एक डेंट (गड्ढा) बन जाता है। इसे हिल सेक्स रीजन कहा जाता है। यह बार-बार डिसलोकेशन होने का एक मुख्य कारण बन सकता है।
बोंन डिफेक्ट
बार-बार कंधा उतरने से सिर्फ लिगामेंट ही नहीं, बल्कि हड्डी भी प्रभावित होती है। इसमें कटोरी का हिस्सा घिस सकता है। इसे बोन डिफेक्ट कहा जाता है। इससे कंधा और ज्यादा अस्थिर हो जाता है।
लक्षण, जांच व उपचार
कंधे में अचानक तेज दर्द होने लगता है। इसके अलावा हाथ हिलाने में कठिनाई आती है। कंधा अपनी जगह से बाहर महसूस होना है। इसके लिए जांच और उपचार जरूरी है। एमआरआई से लिगामेंट और सॉफ्ट टिश्यू की जानकारी मिलती है। सीटी स्कैन से हड्डी के डिफेक्ट का पता चलता है। इनके अलावा फिजियोथेरेपी, मसल्स मजबूत करना और गंभीर मामलों में सर्जरी की आवश्यकता होती है।
तीन प्रकार की होती है टेस्ला एमआरआई मशीन
एमआरआई मशीन की क्षमता “टेस्ला” में मापी जाती है, जो चुंबकीय शक्ति को दर्शाता है।
1. 0.5 टेस्ला- कम पावर वाली मशीन। इसमें इमेज की क्वालिटी अपेक्षाकृत कम होती है।
2. 1.5 टेस्ला-सबसे अधिक उपयोग में आने वाली मशीन है। अच्छी क्वालिटी और सटीक रिपोर्ट देती है।
3. 3 टेस्ला- बहुत उच्च गुणवत्ता की इमेज बनती है। बारीक से बारीक बीमारी का पता लगाने में सक्षम होती है।
लिगामेंट इंजरी में एमआरआई का महत्व
लिगामेंट की चोटें जैसे ्रष्टरु ह्लद्गड्डह्म्, क्कष्टरु द्बठ्ठद्भह्वह्म्4 आदि एक्स-रे में नहीं दिखतीं। ऐसे में एमआरआई बहुत जरूरी हो जाती है, क्योंकि यह सॉफ्ट टिश्यू को स्पष्ट रूप से दिखाता है। चोट की गंभीरता का सही आकलन होता है और सर्जरी या इलाज की सही योजना बनती है।
आधुनिक तकनीक का विकास
आज की एमआरआई तकनीक पहले से कहीं अधिक उन्नत हो चुकी है। नई मशीनों के कारण बहुत छोटी और शुरुआती बीमारियां भी पकड़ में आ जाती हैं। ब्रेन, हार्ट, स्पाइन और जॉइंट्स की विस्तृत जांच संभव है। 3डी इमेजिंग और हाई-रिजोल्यूशन स्कैन उपलब्ध हैं।
अच्छी मशीन और क्वालिटी क्यों जरूरी है?
एमआरआई की रिपोर्ट की सटीकता काफी हद तक मशीन की क्वालिटी पर निर्भर करती है। उच्च टेस्ला मशीन बेहतर इमेज देती है। खराब मशीन से गलत या अधूरी जानकारी मिल सकती है। इसलिए सही निदान के लिए अच्छी मशीन का चयन आवश्यक है।
योग्य रेडियोलॉजिस्ट का महत्व
एमआरआई रिपोर्ट को समझना और सही निष्कर्ष निकालना एक विशेषज्ञ का काम है। इसलिए प्रशिक्षित और अनुभवी रेडियोलॉजिस्ट होना जरूरी है। सही रिपोर्ट से सही इलाज संभव होता है। इसलिए गलत व्याख्या से इलाज में देरी या समस्या हो सकती है।
एमआरआई से सॉफ्ट टिश्यू का पता
एमआरआई विशेष रूप से सॉफ्ट टिश्यू (मांसपेशियां, नसें, लिगामेंट, ब्रेन आदि) को देखने में बेहद प्रभावी है। यह उन समस्याओं को भी दिखा सकता है जो एक्स-रे या सीटी स्कैन में नहीं दिखतीं।
भारत में एमआरआई मशीनों की स्थिति
भारत में आजकल 0.5, 1.5 और 3 टेस्ला की मशीनें प्रचलित हैं। बड़े अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटरों में आधुनिक 1.5टी और 3टी मशीनें आसानी से उपलब्ध हैं।
-क्या एमआरआई सुरक्षित है?
हाँ, यह पूरी तरह सुरक्षित है क्योंकि इसमें रेडिएशन नहीं होता।
-कितनी देर लगती है?
आमतौर पर 20-45 मिनट लगते हैं।
-किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए?
जिनके शरीर में पेसमेकर या मेटल इम्प्लांट है,
गर्भवती महिलाओं को डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
-क्या दर्द होता है?
नहीं, यह पूरी तरह दर्द रहित प्रक्रिया है।

