मिडिल ईस्ट तनाव के कारण प्लास्टिक उद्योग पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। जहां कच्चे तेल की कीमतें बढऩे से प्लास्टिक ग्रेन्यूल की कीमतें 38 रुपए प्रति किलो तक बढ़ गई हैं, जिससे प्लास्टिक उत्पादकों की लागत बढ़ गई है। कई प्लास्टिक इकाइयों का मुनाफा खत्म हो गया है और कुछ जगह उत्पादन लागत भी पूरी नहीं हो पा रही है। प्लास्टिक दाना न मिलने से प्लास्टिक की बोतलों के उत्पादन नहीं हो पा रहा है। कई फैक्टरियों में प्लास्टिक बोतलों का निर्माण बंद होने की कगार पर है। इससे रोजमर्रा की वस्तुएं लगातार बढ़ रही है। प्लास्टिक दाने के दाम में करीब 70-80 फीसदी तक उत्पादन लागत बढ़ गई है। लंबे चलते युद्ध से कच्चे माल की भारी किल्लत के चलते प्लास्टिक दाने और पैकेजिंग मैटीरियल की उपलब्धता में कमी आई है। वर्जिन प्लास्टिक दाना 100 रुपए से बढक़र 180 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गया है और स्क्रैप में भी बढ़ोतरी हुई है। जहां गैस की कमी और बढ़े हुए कच्चे माल के कारण फैक्ट्रियों का उत्पादन 25-30 फीसदी तक सीमित हो गया है। छोटे और मझौले स्तर उद्यमियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। तनाव के कारण शिपिंग कंटेनर के दाम और बीमा की लागत बढ़ गई है। अगर हालत ऐसे ही चलते रहे तो आने वाले समय प्लास्टिक उद्योग पूरी तरह से बंद हो जाएगा। एक तरफ सरकार ने पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी हटाकर राहत देने का प्रयास किया है, जिससे कच्चे माल की लागत कम हो सकेगी। उद्योग जगत कच्चे माल के लिए अन्य देशों से आपूर्ति बढ़ाने पर भी विचार कर रहा है। अगर प्लास्टिक उद्योग को बचाना है तो रिसाइकिल किए गए प्लास्टिक के उपयोग में तेजी लाई जा सकती है। मिडिल ईस्ट में तनाव लंबा चलता है, तो प्लास्टिक उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका असर पैकेजिंग, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अन्य सेक्टरों पर भी पड़ेगा।

