Tuesday, July 14, 2026 |
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भारत में 70 प्रतिशत से अधिक वस्त्र अपशिष्ट का हो रहा पुनर्चक्रण, लाखों लोगों को मिल रहा रोजगार

by Business Remedies
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India Recycles Over 70 Percent Of Textile Waste Through Circular Economy And Sustainable Manufacturing

भारत में वस्त्र उद्योग से निकलने वाले कुल अपशिष्ट का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब पुनर्चक्रण, पुनः उपयोग और अन्य उपयोगी प्रक्रियाओं के माध्यम से दोबारा उत्पादन चक्र में शामिल किया जा रहा है। रविवार को जारी सरकार की एक तथ्य-पत्रिका के अनुसार, यह पहल देश में परिपत्र अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ औद्योगिक विकास को भी गति दे रही है।

परिपत्र अर्थव्यवस्था ऐसी व्यवस्था है, जिसमें संसाधनों और कच्चे माल का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जाता है। इसमें वस्तुओं को फेंकने के बजाय उनका पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता है। इससे अपशिष्ट और प्रदूषण दोनों में कमी आती है तथा प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी घटता है। वस्त्र उद्योग में यह व्यवस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे उत्पादन प्रक्रिया के दौरान ऊर्जा, रसायनों और पानी की खपत कम होती है। साथ ही, मौजूदा सामग्री का दोबारा उपयोग कर पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।

तथ्य-पत्रिका के अनुसार, भारत में हर वर्ष लगभग 78लाख टन वस्त्र अपशिष्ट का प्रबंधन किया जाता है। इसमें से 90 प्रतिशत से अधिक अपशिष्ट घरेलू स्तर पर उत्पादन के दौरान निकलने वाले अवशेष और उपभोक्ताओं द्वारा उपयोग के बाद छोड़े गए वस्त्रों से प्राप्त होता है। उत्पादन इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट के मामले में लगभग 95प्रतिशत सामग्री एकत्र कर दोबारा उपयोग में लाई जाती है, जिससे संसाधनों की बर्बादी काफी कम होती है। सूत निर्माण क्षेत्र इस व्यवस्था का सबसे सफल उदाहरण बनकर उभरा है। इस क्षेत्र में निकलने वाला लगभग पूरा अपशिष्ट फिर से उत्पादन प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाता है। वहीं, उपभोक्ताओं द्वारा उपयोग के बाद छोड़े गए वस्त्रों में से लगभग 55प्रतिशत सामग्री को देशभर में संचालित संग्रह और छंटाई व्यवस्था के माध्यम से कूड़ा भराव स्थलों तक पहुंचने से पहले ही पुनर्चक्रण के लिए भेज दिया जाता है।

यह पूरा तंत्र देश में लगभग 40 से45 लाख लोगों की आजीविका का आधार बना हुआ है। इनमें बड़ी संख्या में वंचित वर्गों की महिलाएं शामिल हैं, जो वस्त्रों के संग्रह, छंटाई, पुनर्वितरण और पुनर्चक्रण से जुड़े कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। भारत की पारंपरिक वस्त्र निर्माण कला और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग को अब वैश्विक स्तर पर भी सराहना मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऐसे उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है, जिनका पर्यावरण पर कम प्रभाव पड़ता हो। इससे भारतीय वस्त्र उद्योग के लिए निर्यात के नए अवसर भी तैयार हो रहे हैं।

तथ्य-पत्रिका में देश के विभिन्न प्रमुख पुनर्चक्रण केंद्रों का भी उल्लेख किया गया है। नवी मुंबई के बेलापुर में स्थापित भारत की पहली नगर पालिका वस्त्र पुनर्प्राप्ति सुविधा वस्त्र अपशिष्ट को आर्थिक अवसर के रूप में विकसित कर रही है। इस केंद्र ने अब तक 30 मीट्रिक टन उपयोग के बाद छोड़े गए वस्त्र एकत्र किए हैं, जिनमें से 25.5 मीट्रिक टन की छंटाई की जा चुकी है। यहां 41,000 से अधिक वस्तुओं का प्रसंस्करण किया गया है और 400से अधिक पुनर्चक्रित नमूने विकसित किए गए हैं। इस पहल से 1.14 लाख परिवारों तक पहुंच बनाई गई है तथा महिला कारीगरों को प्रदर्शनियों और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराई गई है। हरियाणा का पानीपत भी देश का प्रमुख वस्त्र पुनर्चक्रण केंद्र बन चुका है। यहां प्रतिदिन लगभग 3,500 से5,250 टन वस्त्र अपशिष्ट का प्रबंधन किया जाता है। यह केंद्र संग्रह, छंटाई, प्रसंस्करण, बुनाई और पुनर्चक्रण जैसी सभी प्रमुख गतिविधियों का संचालन करता है। बेहतर सामग्री पृथक्करण के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्र-से-वस्त्र पुनर्चक्रण की संभावनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं।

दिल्ली के मंगोलपुरी स्थित कतरन बाजार में असंगठित क्षेत्र की भूमिका भी उल्लेखनीय है। यहां नोएडा, गुरुग्राम, मानेसर, जयपुर और दिल्ली से आने वाले ट्रकों से कपड़े की कतरनें एकत्र की जाती हैं। इसके बाद उन्हें रंग और गुणवत्ता के आधार पर अलग किया जाता है, जिससे उनका पुनर्चक्रण मूल्य बढ़ जाता है। यह बाजार प्रतिदिन 10 टन से अधिक छांटी गई कतरनों की आपूर्ति पानीपत जैसे औपचारिक पुनर्चक्रण केंद्रों को करता है और स्थानीय संग्रह व्यवस्था तथा बड़े पुनर्चक्रण तंत्र के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करता है। सरकार का कहना है कि बदलती वैश्विक मांग को देखते हुए टिकाऊ उत्पादन अब भारतीय वस्त्र उद्योग की सबसे बड़ी ताकत बनता जा रहा है। जैविक रेशों के उपयोग, सुरक्षित रसायनों, परिपत्र उत्पादन, अपशिष्ट पुनर्प्राप्ति, पर्यावरण अनुकूल लेबलिंग और उत्पादों की पूरी जानकारी उपलब्ध कराने जैसी नीतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्वच्छ तकनीक, जिम्मेदार स्रोतों से सामग्री प्राप्त करना, पुनर्चक्रण और अपशिष्ट में कमी जैसे कदम भारतीय वस्त्र उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद करेंगे।

भारत की औद्योगिक प्रगति की रीढ़ माने जाने वाले वस्त्र एवं परिधान उद्योग का देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। National Account Statistics 2025 के अनुसार, यह क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 2प्रतिशत तथा विनिर्माण सकल मूल्य संवर्धन में लगभग 11 प्रतिशत का योगदान देता है। भारत दुनिया का छठा सबसे बड़ा वस्त्र एवं परिधान निर्यातक देश भी है और वैश्विक निर्यात में उसकी लगभग 4प्रतिशत हिस्सेदारी है। यह उद्योग 4.5करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और ग्रामीण क्षेत्र के श्रमिक शामिल हैं। आर्थिक योगदान, निर्यात क्षमता और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन को देखते हुए टिकाऊ उत्पादन अब भारतीय वस्त्र उद्योग की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का प्रमुख आधार बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार उत्पादन प्रणाली अपनाकर भारत वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत कर सकता है।



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