बिजनेस रेमेडीज/जयपुर। तिलक नगर स्थित नवकार भवन में चातुर्मासिक प्रवचन में सोमवार को जैनाचार्य विजयराज म.सा. ने कहा कि पिछले चार दिनों से ‘जीवन निर्वाह’ और ‘जीवन निर्माण’ की चर्चा चल रही है। इसी संदर्भ में हम आज जीवन निर्माण के चौथे घटक ‘स्थिररिता’ पर बात करेंगे। मानव का मन बड़ा चंचल होता है, उसकी बुद्धि चपल तथा उसकी इंद्रियां बेकाबू होती है, ऐसे में भला हमारे जीवन का निर्माण कैसे संभव है? हमें जीवन निर्माण के लिए अपने मन को ‘स्थिर’ करना होगा। हम मन को छोड़ भी नहीं सकते, उसे साथ लेकर ही चलना होगा। उन्होंने कहा कि मन अगर थोड़ा-सा भी हमारे वश में आ गया तो यह हमारे जीवन निर्माण में बहुत सहयोगी, उपयोगी और उपकारी सिद्ध होगा। लेकिन चंचल मन को बस में करना, चपल बुद्धि को शांत करना तथा बेकाबू इंद्रियों को वश में करना बहुत कठिन काम है, बड़े-बड़े ज्ञानी लोग इनके मायाजाल में फंसे जाते है।
आचार्य श्री ने इसे श्रावक-श्राविकाओं को सरलता से समझाने के लिए रतनेमि और राजीमति का वृत्तांत सुनाया। उन्होंने कहा कि जीवन निर्वाह करना बड़ी बात नहीं है, निर्माण करना बड़ी बात है। निर्माण के लिए समय, सम्पर्क, सम्बन्ध तथा स्थिररिता सभी आवश्यक है। अब सवाल उठता है कि ये निर्वाह क्या है? और निर्माण से हमारा आशय क्या है? आचार्य श्री ने बताया कि निर्वाह का मतलब गुजारा करना होता है, जो हम सब कर ही रहे हैं, लेकिन निर्माण के लिए हमें जीवन का उद्धार करना होता है, जो स्थिररिता से हो सकता है। जीवन में परिपक्वता के लिए अनुप्रेक्षा होनी चाहिए, जिससे ज्ञान बढ़ता है और ठोस होता चला जाता है। महाराज श्री ने प्रवचन के दौरान कहा कि बुद्धि चार प्रकार की होती है- मंद बुद्धि, मलीन बुद्धि, मित्र बुद्धि और महान बुद्धि। हमें मंद और मलीन बुद्धि नहीं बनना है, महान बुद्धि हम बन नहीं सकते, तो हमारे लिए मित्र बुद्धि बनना श्रेष्ठ रहेगा।
श्री साधुमार्गी शांतक्रांति जैन संघ ने जानकारी दी कि जैनाचार्य के प्रवचन से पहले वरिष्ठ संत विनोद मुनि म.सा. ने इस चार्तुमास का सदुपयोग कैसे करें-पुण्य से प्राप्त संयोगों का श्रेष्ठ उपयोग कैसे किया जाए? पर चर्चा की। प्रत्याखान की श्रंखला में अन्य प्रत्याखानों के साथ सुश्राविका नीतू ढाबरिया धर्मसहायिका हनुवंत ढाबरिया ने 18 उपवास के प्रत्याखान लिए। सभी श्रावक-श्राविकाओं का संघ संरक्षक प्रदीप गुगलिया, संघ अध्यक्ष महेश दस्सानी, संघ महामंत्री नवीन लोढ़ा ने आभार व्यक्त किया।

