Saturday, July 4, 2026 |
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शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की जरूरत

by Business Remedies
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भारत की शिक्षा व्यवस्था दोयम दर्ज पर खड़ी है, कई सकारात्मक बदलाव तो हुए हैं, लेकिन अभी भी कुछ गंभीर चुनौतियां भी बनी हुई हैं। परीक्षाएं अभी रैंकिंग मशीन बन गई हैं। तीन घंटे में रट्टा, नेगेटिव मार्किंग और एक गलती पर साल खराब। इससे बच्चे, माता-पिता, टीचर सब तनाव में हैं। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है। आज की शिक्षा व्यवस्था परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। एक ओर सुधारों के प्रयास हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गुणवत्ता, समान अवसर, शिक्षक प्रशिक्षण और रोजगारोन्मुख शिक्षा जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि व्यवस्था में सुधार हो रहे हैं, पर अब भी काफी काम किया जाना बाकी है। जहां नई शिक्षा नीति के तहत शिक्षा को अधिक लचीला और कौशल आधारित बनाने का प्रयास किया जा रहा है, कई स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और ऑनलाइन पढ़ाई का उपयोग बढ़ा है। विद्यार्थी को विज्ञान, वाणिज्य और कला के बीच विषय चुनने की अधिक स्वतंत्रता दी जा रही है। वहीं मात/भाषा में प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षाओं का दबाव अभी भी बहुत है। कई स्थानों पर रटकर पढ़ाई अब भी प्रमुख है, जिससे व्यावहारिक ज्ञान और रचनात्मक सोच प्रभावित होती है। सरकारी और शिक्षा की गुणवत्ता में अभी भी बड़ा अंतर है। अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में कई स्कूलों में शिक्षकों, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और इंटरनेट जैसी सुविधाओं की कमी है। इसके अलावा रोजगार के लिए आवश्यक कौशल और उद्योगों की जरूरतों के बीच अभी भी अंतर बना हुआ है, इसलिए कई शिक्षित युवाओं को नौकरी पाने में कठिनाई होती है। खेल, कला, नैतिक शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर पहले की तुलना में अधिक ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन यह अभी सभी विद्यालयों में समान रूप से लागू नहीं है।



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