भारत की अर्थव्यवस्था अब पहले की तुलना में मानसून के झटकों के प्रति काफी कम संवेदनशील हो गई है। पिछले एक दशक में सिंचाई नेटवर्क के विस्तार और खेती के स्वरूप में हुए बदलावों के कारण कृषि तथा ग्रामीण मांग को पहले जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ रहा है। एक नई रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, पहले यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता था तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय पर दिखाई देता था। वर्ष 2002 में वर्षा दीर्घकालिक औसत का केवल 81प्रतिशत रही थी, जिसके चलते खाद्यान्न उत्पादन में तेज गिरावट दर्ज की गई थी और ग्रामीण क्षेत्रों की उपलब्ध आय में भी भारी कमी आई थी।
हालांकि, पिछले एक दशक में यह स्थिति काफी बदल गई है। वर्ष 2018-19 और 2023-24 में सामान्य से कम वर्षा होने के बावजूद भारत में खाद्यान्न उत्पादन लगातार बढ़ता रहा। इससे स्पष्ट होता है कि कृषि क्षेत्र अब केवल मानसून पर निर्भर नहीं रह गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण सिंचाई सुविधाओं का तेजी से विस्तार और पूरे वर्ष खेती करने की प्रवृत्ति का बढ़ना है। अब किसानों के पास नहरों और नलकूपों जैसी बेहतर सिंचाई व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं, जिससे कम वर्षा की स्थिति में भी खेती पर बड़ा असर नहीं पड़ता।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कुल खेती योग्य भूमि का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा अब सिंचाई सुविधाओं से जुड़ चुका है, जबकि 2000 के शुरुआती वर्षों में यह आंकड़ा करीब 42 प्रतिशत था। वहीं, प्रमुख कृषि राज्यों में सिंचाई का दायरा वर्ष 2009 के लगभग 54 प्रतिशत से बढ़कर अब करीब 67 प्रतिशत हो गया है। नलकूप और नहरें अब वर्षा की कमी के प्रभाव को काफी हद तक कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
इसके साथ ही, खरीफ मौसम पर देश की निर्भरता भी लगातार घट रही है। 1990 के दशक तक कुल खाद्यान्न उत्पादन में खरीफ फसलों की हिस्सेदारी लगभग 60प्रतिशत थी, जो 2025-26 में घटकर केवल 47प्रतिशत रह गई है। दूसरी ओर, रबी फसलों और फरवरी से मई के बीच होने वाली ग्रीष्मकालीन बुवाई का महत्व लगातार बढ़ा है। इससे पूरे वर्ष कृषि गतिविधियां जारी रहने लगी हैं और उत्पादन अधिक संतुलित हो गया है। रिपोर्ट का कहना है कि इन संरचनात्मक बदलावों के कारण अब कमजोर मानसून देश की खाद्य सुरक्षा के लिए पहले जैसा बड़ा खतरा नहीं रहा है। साथ ही, ग्रामीण मांग पर भी इसका असर पहले की तुलना में काफी सीमित रहने की संभावना है।
हालांकि, कम वर्षा अब भी नुकसान पहुंचा सकती है, लेकिन इसका प्रभाव पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर एक साथ पड़ने के बजाय कुछ विशेष क्षेत्रों तक सीमित रहने की संभावना है। खाद्य महंगाई के मोर्चे पर भी स्थिति पहले की तुलना में अधिक नियंत्रित रहने की उम्मीद जताई गई है। यदि वर्षा कम होती है तो इसका असर मुख्य रूप से दालों और सब्जियों जैसी चुनिंदा श्रेणियों तक सीमित रह सकता है, जबकि व्यापक स्तर पर कीमतों में तेज बढ़ोतरी की आशंका कम है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश में लगभग 121 मिलियन टन गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन और पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख कृषि राज्यों में बेहतर सिंचाई व्यवस्था देर से होने वाली वर्षा के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर सकती है।
खरीफ बुवाई में देरी को लेकर भी अत्यधिक चिंता की आवश्यकता नहीं बताई गई है। जून के मध्य तक सामान्य बुवाई क्षेत्र का केवल 8प्रतिशत हिस्सा ही बोया गया था, लेकिन यह स्थिति पिछले वर्षों के सामान्य रुझानों से बहुत अलग नहीं है। आमतौर पर खरीफ की अधिकांश बुवाई जुलाई के दूसरे सप्ताह में होती है। हालांकि, रिपोर्ट ने चेतावनी भी दी है कि कमजोर वर्षा का दीर्घकाल में व्यापक आर्थिक प्रभाव पड़ सकता है। कम वर्षा के कारण भूजल का दोहन बढ़ सकता है और सिंचाई के लिए बिजली पर निर्भरता भी अधिक हो सकती है। हाल के वर्षों में जलाशयों का जलस्तर पहले से काफी कम स्तर पर पहुंच चुका है। यदि वर्षा में और कमी आती है तो भूजल के उपयोग में बढ़ोतरी होगी, जिससे कृषि क्षेत्र में बिजली की मांग बढ़ेगी और जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

