Wednesday, March 4, 2026 |
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भारत को बहुपक्षीय व्यापार समझौतों में शामिल होने पर करना चाहिए विचार

by Business Remedies
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punit jain

गत सप्ताह नई दिल्ली में एक औद्योगिक संस्था के मंच से बोलते हुए सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग के मुख्य कार्याधिकारी बीवीआर सुब्रमण्यम ने इस बात की हिमायत की कि भारत को बहुपक्षीय व्यापार समझौतों में शामिल होने पर विचार करना चाहिए। वह क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) और प्रशांत पार साझेदारी के लिए व्यापक एवं प्रगतिशील समझौते (सीपीटीपीपी) का जिक्र कर रहे थे। यह बात अतिरिक्त महत्व की है क्योंकि सुब्रमण्यम पहले वाणिज्य सचिव रह चुके हैं। यह उम्मीद की जा सकती है कि इस वक्तव्य का संदेश यह है कि देश आरसेप और सीपीटीपीपी जैसे बड़े व्यापारिक समझौतों के लाभ को लेकर नए सिरे से विचार कर रहा है। सुब्रमण्यम की दलील एकदम साधारण है। ऐसे बड़े कारोबारी धड़े का हिस्सा बनना महत्वपूर्ण है। सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों के लिए तो यह खास महत्व रखता है जो देश के निर्यात में 40 फीसदी की हिस्सेदारी रखते हैं। उन्होंने संकेत किया कि भारत में स्थित बड़े कॉरपोरेट हाउस निर्यात के मोर्चे पर कमजोर प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से यह देखा गया है कि छोटी कंपनियों का सामना जब बड़े बाजार से होता है तो उनका प्रदर्शन बेहतर रहता है। ऐसा इसलिए कि वे नए प्रकार की मांग से समायोजन को लेकर बेहतर स्थिति में होती हैं। वास्तव में ऐसा व्यापार खुलापन अक्सर जरूरी होता है, ताकि उनका विकास हो और वे स्थिर कारोबारी ढांचे में प्रवेश कर सकें, जहां बड़ी घरेलू कंपनियों का दबदबा है। जब घरेलू बाजार भारत जैसा बड़ा और मुनाफे वाला हो तो प्रभाव काफी बढ़ जाता है।
कंपनियां अपने बाजार तक पहुंच कम करने के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं, बजाय कि विदेशों में बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने के। यह उनके निजी हित में हो सकता है, लेकिन इससे व्यापक कल्याण में इजाफा नहीं होता है और न ही घरेलू मूल्यवर्धन और वृद्धि होती है। वैश्विक मूल्य श्रृंखला में शामिल होने के लिए ऐसे व्यापार समझौतों का हिस्सा बनना जरूरी हो चला है। भारतीय कंपनियों के लिए अवसरों का दायरा बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है।



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