ईरान-इजरायल व अमेरिका युद्ध के कारण छोटे और मझौले उद्योग धंधों पर काफी असर पड़ा है। कच्चे माल की कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई है और मुनाफा घट रहा है। इससे सीधे-सीधे रोजगार पर भी असर पड़ रहा है। जहां कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट से भारत में छोटे और मझौले उद्योग गंभीर संकट में हैं। कच्चे माल प्लास्टिक, एल्यूमीनियम, रसायन की 25 से 75 फीसदी तक लागत बढऩे और लॉजिस्टिक्स ठप होने से उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिससे टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग जैसे सेक्टरों पर बुरा असर पड़ रहा है। कपड़े के दाम बढ़ गए हैं, जिससे निर्यात प्रभावित हो रहा है। ऑर्डर रुक गए हैं और उत्पादन प्रभावित हो रहा है। वहीं हैंडलूम उद्योग में भी ऑर्डर रुक गए हैं और मजदूरों की आय प्रभावित हो रही है। फार्मा उद्योग में कच्चे माल की कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई है। स्टील उद्योग भी काफी प्रभावित हो रहा है, कच्चे माल की कीमतें बढ़ गई हैं। अगर युद्ध लंबा चलता है तो कच्चे माल की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिससे उत्पादन लागत और बढ़ेगी। निर्यात और भी प्रभावित हो सकता है, जिससे रोजगार पर और भी असर पड़ेगा। मजदूरों की आय और भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में उद्योगों को कच्चे माल की वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए। इसके अलावा उत्पादन लागत कम करने के लिए प्रयास करना चाहिए। निर्यात बढ़ाने के लिए प्रयास करना चाहिए। वहीं संघर्ष के लंबा खिंचने की स्थिति में सरकार भी कमजोर वर्गों, खासकर सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यम क्षेत्र के लिए और राहत पैकेज ला सकती है। जहां सरकार पहले ही पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती जैसे कई कदम उठा चुकी है और जरूरत पडऩे पर आगे भी राहत उपाय करने से पीछे नहीं हटेगी। सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क घटाकर तीन रुपए प्रति लीटर कर दिया है और डीजल को इस कर से मुक्त कर दिया है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर आम लोगों पर कम पड़े।

