सर्दियों के अंत और फसल की शुरुआत का प्रतीक लोहड़ी आज हर्षोल्लास से मनाई जाएगी। लोहड़ी का त्योहार दिन लंबे होने की शुरुआत का भी प्रतीक है। यह वह समय है, जब किसान अपनी अच्छी फसल के लिए प्रकृति को धन्यवाद देते हैं और जश्न मनाते हैं। इस त्योहार के साथ ही आने वाले साल में खुशहाली के लिए प्रार्थना भी करते हैं। लोहड़ी के विशेष अवसर पर लोग आंगन या खुले चौक में पारंपरिक रूप से अलाव जलाते हैं और भांगड़ा व गिद्दा जैसे पारंपरिक नृत्य करते हैं। आभार के प्रतीक के रूप में आग में अनाज, मिठाइयां, मूंगफली, पॉपकॉर्न जैसी चीजें चढ़ाई जाती हैं। इस दिन सरसों का साग, मक्के की रोटी, गजक और रेवड़ी जैसे पारंपरिक पकवानों का आनंद लिया जाता है। लोहड़ी को लेकर मशहूर लोक नायक दुल्ला भट्टी की कहानी अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध है। लोहड़ी के पारंपरिक गीतों में भी दुल्ला भट्टी का जिक्र आता है। एक समय में मुगल राजा अकबर के काल में दुल्ला भट्टी नामक एक लुटेरा पंजाब में रहता था। वह धनी लोगों को लूटकर उनसे मिले सभी धन को गरीब की मदद में लगा देता था। दुल्ला भट्टी पंजाब के रॉबिन हुड नाम से भी प्रसिद्ध है। जनवरी के महीने में जब कड़ाके की ठंड से पूरा उत्तर भारत ठिठुर रहा होता है, उसके बीच में ही लोहड़ी का त्योहार आता है। लोहड़ी अपने साथ फसलों के नए मौसम का संदेश लेकर आती है। ढोल की थाप और लोकगीतों की सुरीली धुनों के साथ जलती आग ठंड के मौसम में त्योहारों की गर्माहट जगाती है। इस दिन लोग अपने परिवारों, मित्रों और नाते-रिश्तेदारों के साथ जुटते हैं। आग के चारों ओर फेरी लगाते हैं। नाचते-गाते हैं, आग के चारों ओर फेरी लगाते हैं। लोहड़ी समुदाय और फसल का उत्सव है। यह परिवारों और दोस्तों के एक साथ आने, उपहारों का आदान-प्रदान करने और रिश्तों को मजबूत करने का समय है।




