भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निरंतर अर्थव्यवस्था को सम्बल प्रदान करने और देश को विकसित देशों की श्रेणी में लाने के लिए प्रयासरत हैं। इसका जीता जागता उदाहरण पीएम मोदी की जापान और चाइना की यात्रा है। प्रधानमंत्री मोदी की जापान और चीन यात्रा वैश्विक कूटनीतिक के परिदृश्य में एक निर्णायक पड़ाव साबित हुई है। जापान यात्रा के दौरान ११ समझौतों पर सहमति जताने से निवेश की प्रबल संभावना बन गई है। जहां भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान इतिहास का सबसे बड़ा निवेश पैकेज घोषित हुआ है। जापान ने अगले दस वर्षों में करीब 68 अरब डॉलर भारत में निवेश करने का वचन दिया है। यह घोषणा उस समय आई है जब वैश्विक आर्थिक परिदृश्य अस्थिर है और कई पश्चिमी निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। भारत अब वैश्विक राजनीति में अपनी स्थिति को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। खासकर उस समय में जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर 50 फीसदी तक के टैरिफ थोप दिए हैं। पीएम मोदी की जापान और चीन यात्रा बताती है कि भारत अब केवल साझेदारियों का हिस्सा भर नहीं है बल्कि स्वयं एक ध्रुव के रूप में उभर रहा है। जापान के साथ तकनीकी और निवेश सहयोग, चीन में एससीओ मंच पर वापसी और अमेरिका से बढ़ते तनावों के बीच नई राह तलाशना ये सभी घटनाएं मिलकर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को प्रकट करती है। अमेरिका से बढ़ते तनाव के बीच यह साफ हो गया है कि व्यापार और तकनीकी साझेदारी को किसी एक देश पर निर्भर नहीं छोड़ा जा सकता। यही कारण है कि भारत ने जापान, चीन और रूस के साथ संवाद और सहयोग बढ़ाने का रास्ता चुना है।

