भारत को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दवा निर्माता होने के कारण विश्व की फार्मेसी भी कहा जाता है। यहां दुनिया की 60 प्रतिशत वैक्सीन और 20 प्रतिशत जैनेरिक दवाएं बनती हैं परंतु अब इनमें मिलावट का धंधा शुरू हो गया है। जो देश और विदेशों में खपत की जा रही है। देश के लिए यह आने वाले समय में घातक सिद्ध हो सकती है और छवि पर भी इसका विपरित असर पडऩे की संभावना नजर आ रही है। वहीं फिलहाल भारत का फार्मास्यूटिकल्स निर्यात सालाना आधार पर ७.३८ प्रतिशत बढक़र ४.९ बिलियन डॉलर पर पहुंच गया है। पिछले दिनों भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (एसोचैम) की जारी रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत में बनी 25 प्रतिशत दवाएं नकली या घटिया हैं। बुखार, शूगर, ब्लड-प्रैशर व पेन-किलर और कैंसर तक की घटिया या नकली दवाएं बाजार में कई स्वदेशी एवं विदेशी कंपनियों के नाम से बेची जा रही हैं। इस वर्ष मार्च के महीने में ही यूपी में चल रहे कारखाने में बच्चों के जीवन रक्षक सिरप, लिवर की दवा और पेन-बाम समेत 7 ब्रांड्स की नकली दवाइयां, फैविकोल, रैपर, शीशियां, स्टिकर और पैकिंग मशीन बरामद कीं। वहीं मई को बिहार में नकली और नशीली दवाओं के कारोबारियों के विरुद्ध कार्रवाई के दौरान जीवन रक्षक दवाओं के टैबलेट, इंजेक्शन और नशीली दवाओं सहित लगभग 4 करोड़ रुपए मूल्य की नकली दवाएं जब्त की गई है। जून माह में कैंसर की नकली दवाएं बेचने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह के 6 सदस्यों को गिरफ्तार करके उनसे लाखों रुपए मूल्य की कैंसर की नकली दवाएं बरामद कीं। इसके अलावा जून महीने में ही राजस्थान में नकली दवाएं बनाने और कई राज्यों में बेचने के आरोप में एक को गिरफ्तार किया गया। वह और उसके साथी उत्तराखंड में एक फैक्टरी में नकली दवाइयां बनाते थे। नकली दवाओं का चलन पिछले काफी समय से चल रहा है। अगर समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगा तो देश के लिए घातक तो है ही, साथ ही आने वाले समय में विदेश में किए जा रहे निर्यात पर भी बंदिशें लगना लाजमी है। ऐसे में भारत की बदनामी से बचने के लिए सरकार को नकली दवाएं बनाने वाले अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है।

