बिजऩेस रेमेडीज/नई दिल्ली
नोवो नॉर्डिस्क द्वारा हाल ही में की गई एक स्टडी से पता चला है कि भारत में PWUO (पीपल विद ओबेसिटी) के सामने बड़ी चुनौतियां है। ये स्टडी मोटापे से ग्रस्त 2,000 से अधिक लोग (पीडब्ल्यूओ) और 300 हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स (एचसीपी) पर की गई थी। अध्ययन से मोटापे के बारे में जागरूकता, समझ और प्रबंधन के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर पता चल रहा है, जो उपचार के लिए एक एकीकृत, दीर्घकालिक दृष्टिकोण की जरूरत को रेखांकित करता है।
अध्ययन से पता चला है कि भारत में हर तीन में से एक पीडब्ल्यूओ अपनी स्थिति की गंभीरता को नहीं समझता है और अक्सर खुद को केवल अधिक वजन वाला या सामान्य वजन वाला मानता है। यह मोटापे को लेकर फैली गलत धारणाओं और इसके प्रभावों के प्रति जागरूकता की कमी को दर्शाता है, जो इलाज में देरी और खराब स्वास्थ्य परिणामों को बढ़ाती है। अक्सर इस बात को नजऱअंदाज कर दिया जाता है कि मोटापा कई जटिलताओं से जुड़ा हुआ है, जो शरीर के हर हिस्से को प्रभावित करता है। इसमें शारीरिक, मेटाबॉलिक, हार्ट संबंधी, कैंसर, मानसिक और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं शामिल हैं। मोटापे से ग्रसित हर पांच में से दो व्यक्ति (पीडब्ल्यूओ) हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज जैसी परेशानियों से पीड़ित हैं।
हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स (HPC) की रिपोर्ट के अनुसार, कई पीडब्ल्यूओ को 1 से 4 परेशानियां साथ होती है। जैसे हाई ब्लड प्रेशर (32%), हाई कोलेस्ट्रॉल (27%), ईटिंग डिसऑर्डर (23%) और हृदय संबंधी बीमारियां (19%)। यह इस तथ्य को मजबूत करता है कि मोटापा एक लंबी बीमारी है, जिसके लिए मेडिकल सलाह की आवश्यकता होती है।
नोवो नॉर्डिस्क इंडिया की वाइस प्रेसिडेंट (क्लिनिकल, मेडिकल, रेगुलेटरी और फार्माकोविजिलेंस) डॉ. माया शर्मा ने इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा कि मोटापे के प्रबंधन की दिशा में पहला कदम यह समझना है कि यह एक दीर्घकालिक बीमारी है। हमें पीडब्ल्यूओ को ऐसे उपकरण और संसाधन प्रदान करने की आवश्यकता है, जो न केवल उनका वजन कम करने में मदद करें, बल्कि लंबे समय तक उस वजन को बनाए रखने में भी सहायक हों।
मोटापे से पीडि़त लोगों (पीडब्ल्यूओ) को वजन घटाने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और वजन को बनाए रखने में अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। सर्वेक्षण में शामिल आधे से अधिक लोगों ने बताया कि बदलाव के प्रयासों के बावजूद, वे अपनी पुरानी खाने की आदतों पर लौट जाते हैं। प्रेरणा की कमी, असफलता का डर, अस्वास्थ्यकर खाने की आदतें और व्यायाम की कमी इसमें सबसे आम बाधा है। चिंताजनक रूप से, 44 प्रतिशत लोग छह महीनों के भीतर अपना घटाया हुआ वजन फिर से बढ़ा लेते हैं।
यह स्पष्ट करता है कि केवल जीवनशैली में बदलाव से परे, अधिक टिकाऊ और दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता है। 70 प्रतिशत से अधिक पीडब्ल्यूओ मोटापे को एक गंभीर और दीर्घकालिक बीमारी के रूप में मान्यता देते हैं, फिर भी कई लोग इसे प्रबंधित करना केवल अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानते हैं। सकारात्मक रूप से, पांच में से चार हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स अपने मरीजों के साथ वजन के मुद्दों पर चर्चा करने में सहज हैं।
विक्रांत श्रौतिया, कॉरपोरेट वाइस प्रेसिडेंट, नोवो नॉर्डिस्क इंडिया ने कहा कि हालिया शोध ने भारत में मोटापे से पीड़ित लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली धारणाओं और चुनौतियों पर प्रकाश डाला है। बढ़ती जागरूकता के बावजूद, अभी भी कई बड़ी गलतफहमियां और बाधाएं हैं, जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। इसलिए, भारत में बढ़ती मोटापे की समस्या से निपटने के लिए सरकार की भागीदारी बहुत जरूरी है। मोटापा केवल एक व्यक्तिगत मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता है। प्रभावी समाधान करने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें नीतिगत हस्तक्षेप, जागरूकता कार्यक्रम और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं के समाधान शामिल हों।

