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- महिला वैज्ञानिकों ने बाँटी हौसले और हिम्मत की कहानियाँ
- राजस्थान विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न
जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र विभाग और डिज़ाइन इनोवेशन सेंटर द्वारा आयोजित दो दिवसीय “Advancing Research Frontiers for Global Impact: Strategies for Scientific Excellence” राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन पेटेंट, डिज़ाइन और ट्रेडमार्क के कंट्रोलर जनरल प्रोफेसर उन्नत पंडित ने टेक्नॉलॉजी हॉल में किया। उन्होंने कहा कि कोई भी विश्वविद्यालय तब तक महान नहीं हो सकता, जब तक वह समाज के “दर्द को पढ़ना” नहीं सीखता। उन्होंने शोधार्थियों से आह्वान किया कि वे पहले पानी की कमी, जलवायु संकट, ग्रामीण रोज़गार और टिकाऊ तकनीक जैसे ज़मीनी मुद्दों को समझें, फिर ऐसी तकनीक और समाधान गढ़ें जो लैब से निकलकर आम लोगों तक पहुँचें। प्रोफेसर पंडित ने स्टार्ट-अप इकोसिस्टम का उदाहरण देते हुए बताया कि पहले लगभग 80 प्रतिशत स्टार्ट-अप बंद हो जाते थे, जबकि 2025 में यह संख्या काफ़ी घट गई है। उन्होंने पूछा, “जब स्टार्ट-अप बदल रहे हैं, क्या हमारे कैंपस भी बदलाव को तैयार हैं?” उन्होंने ‘विकसित भारत @2047’ को साझा संकल्प बताते हुए कहा कि विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और जीवन विज्ञान, सभी के शोधकर्ता इस यात्रा में समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। कार्यशाला की संयोजक और रसायन विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नीलिमा गुप्ता ने कहा, “इन दो दिनों का लक्ष्य सिर्फ़ सर्टिफ़िकेट देना नहीं, बल्कि ऐसी सोच विकसित करना है जिससे हमारे प्रोजेक्ट फंडेबल भी हों, पेटेंटेबल भी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किए जाने योग्य भी। अगर कुछ शोध सचमुच सेमिनार कक्ष से निकलकर समाज तक पहुँचे, तो वही इस कार्यशाला की असली सफलता होगी।”
कुलगुरु प्रोफेसर अल्पना कटेजा ने विद्यार्थियों और अध्यापकों से भारत सरकार की शोध योजनाओं का अधिकतम लाभ उठाने और “राजस्थान विश्वविद्यालय को फिर से शिखर पर ले जाने” का संकल्प लेने का आह्वान किया। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं से जुड़े प्रो. एन.सी. देसाई ने विस्तार से बताया कि शोध को पेटेंट योग्य कैसे बनाया जाए और ऐसी पांडुलिपि कैसे लिखी जाए जिसे शीर्ष पत्रिकाएँ गंभीरता से लें।
दूसरे दिन की शुरुआत डॉ. रोहित भाटिया के सत्र से हुई, जिसमें उन्होंने AI और वैज्ञानिक लेखन के संदर्भ में शोध-पत्र की संरचना, सरल भाषा में परिणाम लिखने और सही जर्नल चुनने की व्यावहारिक बातें साझा कीं। इसके बाद बिरला साइंटिफिक रिसर्च, जयपुर के कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर पुर्णेंदु घोष ने हर शोधकर्ता के भीतर बसे “बच्चे” यानी जिज्ञासा को ज़िंदा रखने की बात करते हुए 21वीं सदी के “एल्गोरिद्म और आकांक्षाओं” पर चर्चा की। सबसे प्रभावशाली सत्र “Career Opportunities and Success Stories: Women Achievers in STEM” रहा। डॉ. टी. शुभमंगला, IAS ने डॉक्टर से लेकर सिविल सेवा तक की यात्रा सुनाते हुए कहा कि आज की भारतीय बेटी प्रयोगशाला से नीति-निर्माण तक “अपनी कुर्सी खुद बना रही है।” डॉ. इला देसाई ने 70 के दशक में लड़कियों की शिक्षा की उपेक्षा और प्रगतिशील किसानों द्वारा खोले गए स्कूल-कॉलेजों का ज़िक्र किया। डॉ. रेनू जोशी ने छात्राओं को अपने मनचाहे करियर को निडर होकर चुनने की प्रेरणा दी। प्रोफेसर विद्या पाटनी ने विश्वविद्यालय इनोवेशन क्लस्टर के अनुभव साझा करते हुए लड़कियों से कहा कि लक्ष्य साफ़ तय करो, उसे रोज़ याद करो और किसी भी भटकाव को रास्ते में मत आने दो। प्रोफेसर अंशु डांडिया ने पारिवारिक हतोत्साहन के बावजूद विज्ञान चुनने और बाद में सौर पैनल दक्षता पर काम करने वाली अपनी कंपनी की सफल यात्रा सुनाकर छात्राओं में उद्यमिता का आत्मविश्वास जगाया।
समापन सत्र में सर्वश्रेष्ठ शोध-पत्र पोस्टर पुरस्कार और ट्रॉफी प्रदान की गईं। संयोजक एवं विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नीलिमा गुप्ता ने दो दिवसीय कार्यशाला की रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके बाद इंडियन सोसायटी ऑफ केमिस्ट्स ऐंड बायोलॉजिस्ट्स के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने रसायन विज्ञान अनुसंधान में उनके योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया।
प्रोफेसर नीलिमा गुप्ता

