Wednesday, July 1, 2026 |
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पाप का थोड़ा-थोड़ा विराम करते रहें तो आनंद की प्राप्ति होती रहेगी: जैनाचार्य विजयराज म.सा.

तिलक नगर के सूर्य मार्ग स्थित नवकार भवन में चातुर्मासिक प्रवचन

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बिजनेस रेमेडीज़/जयपुर। तिलक नगर के सूर्य मार्ग स्थित नवकार भवन में चातुर्मास के छठवें दिन बुधवार को प्रवचन में जैनाचार्य श्री विजयराज म.सा. ने मंगलाचरण के बाद भगवान महावीर के उत्तराध्ययन सूत्र के 31 वें भाग की दूसरी कथा पर विवेचना करते हुए प्राणातिपाप पर कहा कि मानव में असंयम से निवृति और संयम से प्रवृति की सोच विकसित होनी चाहिए। असंयम में भोग बुद्धि रहती है, जबकि संयम त्याग बुद्धि होती है। मानव जीवन में यह दोनों विद्यमान रहती है। पर इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भोग बुद्धि से पाप का सृजन होता है और त्याग बुद्धि से छुटकारा मिलता है। संयम का परिणाम बहुत अच्छा है। परिणाम का चिंतनी होता है, वह भोग बुद्धि से दूर होता है। सज्जन लोग पाप कर पश्चाताप, साधु-संत प्रायश्चित और सामान्य लोग पाप करते रहते हैं। पाप करके दुर्जन ना बने। पाप की प्रशंसा, प्रेरणा, प्रोत्साहन ना करें। पाप हो जाए तो उस पर अहंकार ना करें। मानव मात्र को पाप का थोड़ा-थोड़ा विराम करते रहने चाहिए, तभी उसे आनंद की प्राप्ति होती रहेगी। अगर ऐसा नहीं करता है तो उसे दुखों का सामना करना पड़ेगा।
आचार्य श्री ने श्रावक-श्राविकाओं को उदाहरण देकर भी समझाया कि हम पहले से ही कहीं जाने पर और वहां खाना खाने के बाद उसकी प्रशंसा करने लगते हैं, जो कि सही नहीं है। उन्होंने इसके लिए आमेर किले के महाराजा सवाई जयसिंह का दृष्टांत देते हुए समझाया कि उनके दीवान ने उनकी प्रशंसा नहीं कर केवल यही कहा कि आप जैसे राजा-महाराजा ही किला बना सकते हैं। उन्होंने इसके लिए ना तो उनकी निंदा ही की और ना ही प्रशंसा। प्रशंसा में भी विवेक का होना जरूरी है। बिना विवेक के झूठी प्रशंसा पाप के समान है। पाप की ना तो प्रशंसा और ना ही प्रतिक्रिया करो। किसी से वैर करने पर क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध से वैर की भावना जागृत होती है, इसलिए सभी से प्रेम का भाव रखना जरूरी है। अगर मानव में प्रेम का भाव है तो उसमें दया,वासल्य, करूणा, अनुकंपा का भाव निहित रहेगा। इन सभी भावों से मानव कभी जीव हिंसा नहीं करेगा। प्रेम का एकाकार होना राग है, जबकि राग का विस्तार या फैलाव होना प्रेम है। हर मानव को प्रेम के भाव को जगाने की जरूरत है। प्रेम संबंध, सयोग नहीं है, यह स्वभाव है। आचार्य श्री ने चिंता और चिंतन का अर्थ बताते हुए कहा कि चिंता समस्या है और चिंतन समाधान है। उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं को समझाते हुए बताया कि सोचते रहना यह चिंता है, जो अंधकार की ओर ले जाता है। जबकि सोचकर निर्णय लेना चिंतन है, जो उजाले की ओर ले जाता है। प्रवचन के दौरान महाराज श्री ने भजन ‘अपना कर्तव्य करते चलो, चिंता करने से कैसे चलेगा…’ आंधी हो या तूफान हो चिंता करने से कैसे चलेगा…’ माना मंजिल बहुत दूर है, बाधाएं बहुत हैं…’ सुनाकर नवकार भवन को भक्तिमय से धर्ममय बना दिया। उन्होंने बुधवार को मुनि और सेठ का दृष्टांत का समापन कर स्वाध्याय करने का महत्व और उपयोगिता के बारे में बताया। आचार्य श्री के प्रवचन से पहले श्री विनोद मुनि म.सा. ने जैन दर्शन पर विस्तृत विवेचना की। नेहा श्री साध्वी ने प्रवचन से संबंधित श्रावक-श्राविकाओं से प्रश्न पूछकर उत्तर प्राप्त किये। प्रत्याख्यानों की श्रृंखला में बियासन, एकासना, आयम्बिल, नीवीं, उपवास, बेले, तेलें, चार, पांच, छह, सात आदि प्रत्याख्यानों के साथ आठ उपवास के वसंत जी कुम्भट, गीता जैन, पुखराज जैन व श्राविका नीतू ढाबरिया ने 27 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। वहीं श्रावक-श्राविकाओं सहित चारित्र आत्माओं की बहुत गुप्त तपस्याएं जारी है। धर्मसभा के अंत में संचालन करते हुए संघ के महामंत्री नवीन लोढ़ा ने सभी बाहर से आए व सभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं का स्वागत कर आभार व्यक्त किया व 19,20,21 जुलाई को होने वाले स्वाध्यायी शिविर व शेयर बाजार प्रतियोगिता की जानकारी धर्मसभा को दी।



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