बिजनेस रेमेडीज़/जयपुर। तिलक नगर के सूर्य मार्ग स्थित नवकार भवन मंडपम् में चातुर्मास के चौथे दिन सोमवार को प्रवचन में जैनाचार्य श्री विजयराज म.सा. ने मंगलाचरण के बाद भगवान महावीर के उत्तराध्ययन सूत्र के 31 वें भाग ‘चरण विधि’ पर कहा कि जैसे सनातन धर्म में गीता और जैन धर्म में उत्तराध्ययन सूत्र में इस पद्धति का निरूपण किया है। जीवन के दो पक्ष हैं-प्रथम निवृति और दूसरी प्रवृति। मानव के जीवन में इन दोनों का होना बहुत जरूरी है। जैसे दोनों पैरों से ही चलना हो पाता है, उसी तरह से निवृति और प्रवृति से ही मानव आगे बढ़ पाता है। अगर यह नहीं हो तो जीवन में शून्यता आ जाती है। सांसारिक लोगों को निवृति संयम से लेनी चाहिए और प्रवृति धर्म से प्रेरित होकर लेनी चाहिए। जीवन की अनिवार्यता धर्म में निहित है, पाप को अनिवार्यता नहीं माने। महाराज श्री ने कहा कि असंयम पाप है और संयम धर्म है। अशुभ से बचना ही सबसे बड़ा शुभ है। पाप से बचते हैं, तो अशुभ से निवृति ले लेते हैं। आज लोगों में पाप को समझने की प्रवृति नहीं है, अगर इसे समझ जाएं तो निश्चित रूप से उनका कल्याण और मंगल हो जाए। समझ ही समाज व परिवार में पारस्परिकता बनाती है। जीवन को बनाने और संवारने का काम समझ ही करती है। उन्होंने कहा कि नरक का परमिट व पासपोर्ट पाप है और स्वर्ग का परमिट व पासपोर्ट धर्म है। पाप के भी कई रूप हैं इनमें प्रथम प्राणाधि पाप है, जो जीव हिंसा की ओर प्रेरित करता है। पाप कैसा भी हो यह हमारे लिए श्राप है, इससे बचें। पाप डूबोता है, जबकि जहर मारता है। दोनों की एक ही समानता है। आज मानव के चौबीस घंटे में एक घंटे भी ऐसा नहीं जाता है, जब वह जीव हिंसा या फिर हत्या नहीं करता हो।
महाराज श्री ने इसके लिए मुनिराज और एक सेठ का उदाहरण देकर श्रावक-श्राविकाओं को सहज और सरल तरीके से जीव हिंसा के बारे में समझाया। उन्होंने कहा कि मुनिराज के गोचरी के दौरान सेठ ने उन्हें देशी घी से बना सत्तु परोसा, पर मुनिराज ने उन सत्तुओं को ग्रहण करने से मना कर दिया। उन्होंने सेठ से कहा तुम लाल रंग का रूई का टुकड़ा लाओ, तुम्हें बताता हूं कि कैसे जीव हिंसा होती है। जब सेठ ने रूई का टुकड़ा वहां रखा तो उन सत्तुओं में से जीव निकलकर बाहर आने लगे। तब मुनि ने समझाया कि इसलिए मैं सत्तू खाने (अल्पने) से मना कर रहा था। ऐसे ही उन्होंने दही और लड्डुओं का भी उदाहरण देकर श्रावक-श्राविकाओं को समझाया। आचार्य श्री ने प्रवचन के दौरान कहा कि सभी दुखों का अंत स्वाध्याय से हो सकता है। अगर मानव स्वाध्याय की ओर उन्मुख होता है, तो उसे दुख का अनुभव नाममात्र भी नहीं होगा। महाराज श्री ने कहा कि आज अच्छे विचारों को सुनने वाले लाखों व हजारों में मिल जाएंगे, पर उसे आचरण में लाने वाले बहुत कम मिलेंगे यानि ऐसे सैकड़ों में भी नहीं है। आचार्य श्री ने प्रवचन से पहले भजन गाकर श्रावक-श्राविकाओं को प्रेरित किया। महाराज श्री के प्रवचन से पहले विनोद मुनि म.सा. ने जैन दर्शन और भगवान महावीर के संदर्भ में विवेचना की। उन्होंने कहा कि ज्ञान को बढ़ाना है तो मानव में जिज्ञासा का भाव होना चाहिए। प्रवचनों के बाद महासती नेहा श्री म.सा.ने श्रावक-श्राविकाओं से महाराज श्री द्वारा किए गए प्रवचन को लेकर प्रश्न भी पूछे। प्रत्याख्यानों की श्रृंखला में बियासन, एकासना, आयम्बिल, नीवीं, उपवास, बेले, तेलें, चार, पांच, छह उपवास आदि प्रत्याख्यानों के साथ सोमवार को श्राविका नीतू ढाबरिया ने 25 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। वहीं श्रावक-श्राविकाओं सहित चारित्र आत्माओं की गुप्त तपस्याएं जारी है। धर्मसभा के अंत में संचालन करते हुए संघ के महामंत्री नवीन लोढ़ा ने सूचना दी कि 19,20 व 21 जुलाई को स्वाध्याय शिविर आयोजित किया जाएगा। इसके अलावा उन्होंने सभी बाहर से आए व सभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं का आभार व्यक्त किया।

