नई दिल्ली,
भारत को अपनी मजबूत आर्थिक वृद्धि और नेट-जीरो लक्ष्य के बीच संतुलन बनाने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में हर वर्ष लगभग 145 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। यह निवेश मुख्य रूप से बिजली उत्पादन, ऊर्जा भंडारण और विद्युत ग्रिड के आधुनिकीकरण पर केंद्रित रहेगा। यह जानकारी ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र की डेटा विश्लेषण कंपनी वुड मैकेंजी की रिपोर्ट में दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत वर्ष 2030 तक 1.5 अरब टन कोयला उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। साथ ही ऊर्जा मिश्रण को विविध बनाने के लिए कोयला गैसीकरण पर भी जोर दिया जा रहा है।
रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि प्राकृतिक गैस की मांग वर्ष 2024 में 72 अरब घन मीटर से बढ़कर वर्ष 2050 तक 140 अरब घन मीटर से अधिक हो सकती है। वर्ष 2030 तक कुल मांग में दो-तिहाई से अधिक हिस्सा उद्योग क्षेत्र का रहेगा, जबकि वर्ष 2050 तक यह हिस्सा 55 प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत की आर्थिक वृद्धि और जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच कई चुनौतियां हैं, लेकिन इसके बावजूद भारत वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा और बैटरी आपूर्ति श्रृंखला में चीन के विकल्प के रूप में उभरने की मजबूत स्थिति में है। वैश्विक बाजार जब अपने आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं, तब भारत के परिपक्व विनिर्माण तंत्र को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिल सकती है।
वुड मैकेंजी के एशिया प्रशांत क्षेत्र के उपाध्यक्ष जोशुआ एनगु ने कहा कि भारत को अपनी तात्कालिक ऊर्जा सुरक्षा के जोखिम को कम करने के साथ-साथ कम-कार्बन ढांचा तैयार करना होगा, ताकि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में अग्रणी स्थान हासिल कर सके। कंपनी की पावर एंड रिन्यूएबल्स रिसर्च की उपाध्यक्ष राशिका गुप्ता ने कहा कि वर्ष 2026 से 2035 के बीच ऊर्जा परिवर्तन के लिए 1.5 ट्रिलियन डॉलर का निवेश केवल मेगावाट क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिजली तारों और ग्रिड ढांचे को मजबूत करने पर भी निर्भर करता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बाजार सुधारों की गति, विशेष रूप से बिजली संशोधन विधेयक, वितरण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए महत्वपूर्ण होगी। इससे ग्रिड आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक पारदर्शी निवेश संकेत मिल सकेंगे। ऊर्जा परिवर्तन में तेजी के बावजूद रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निकट अवधि में हाइड्रोकार्बन ईंधन स्थिरता के लिए आवश्यक बने रहेंगे। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता 87 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट में अपस्ट्रीम क्षेत्र को पुनर्जीवित करने और अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों को भारत में अन्वेषण और उत्पादन गतिविधियों में आकर्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।




