New Delhi,
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल ही में इज़राइल यात्रा ने दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई मजबूती दी है। एक अंतरराष्ट्रीय लेख के अनुसार, यह कदम केवल कूटनीतिक पहल नहीं बल्कि एक सुसंगठित भू-आर्थिक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को मजबूत करना है। प्रधानमंत्री मोदी ने इज़राइल की संसद में अपने संबोधन के दौरान भारत की व्यापक रणनीतिक सोच को स्पष्ट किया। उन्होंने संकेत दिया कि भारत एक ऐसे क्षेत्रीय ढांचे का निर्माण कर रहा है, जिससे पश्चिमी देशों के साथ व्यापार और संपर्क को मजबूत किया जा सके, जिसमें इज़राइल की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
चीन के प्रभाव से बाहर निकलने की रणनीति
भारत की यह पहल मुख्य रूप से चीन के बढ़ते प्रभाव से बाहर निकलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास मानी जा रही है। अब भारत शीत युद्ध के समय की गुटनिरपेक्ष नीति से आगे बढ़ते हुए ऐसे देशों के साथ साझेदारी को प्राथमिकता दे रहा है, जिनकी नीतियां स्थिर और भरोसेमंद हैं। यह रणनीति उन देशों को प्राथमिकता देती है, जिनकी आर्थिक प्रगति और सुरक्षा एक नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर निर्भर करती है। इससे भारत अपने दीर्घकालिक हितों को सुरक्षित करना चाहता है। भारत की पूर्वी भूमध्यसागर क्षेत्र के लिए जो योजना है, उसका केंद्र भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा है। यह केवल एक व्यापार मार्ग नहीं है, बल्कि इसे चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को एक ऐसा विकल्प देना है, जो पारदर्शिता और साझा मूल्यों पर आधारित हो, जिससे चीन के व्यापार और ऊर्जा नेटवर्क पर पकड़ को कम किया जा सके।
चीन की मजबूत पकड़ और चुनौती
पिछले एक दशक में चीन ने परिवहन, ऊर्जा और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश करके मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और यूरोप में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाई है। इससे एक ऐसी आर्थिक निर्भरता बनी है, जिसमें कई देशों के हित चीन की रणनीतिक नीतियों से जुड़े हुए हैं। चीन की यह स्थिति अभी भी काफी मजबूत है, क्योंकि उसके पास पहले से स्थापित परियोजनाएं और नेटवर्क मौजूद हैं, जैसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और ग्वादर बंदरगाह। इसके अलावा, ईरान और खाड़ी देशों के साथ उसके गहरे संबंध भी उसकी ताकत को बढ़ाते हैं। भारत के लिए इस नए आर्थिक गलियारे को सफल बनाने के लिए ऐसे देशों की जरूरत है, जो स्थिर और तकनीकी रूप से मजबूत हों। इज़राइल और ग्रीस जैसे देश इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, कुछ अन्य मार्ग भौगोलिक रूप से आसान हो सकते हैं, लेकिन उनमें वह स्थिरता और सुरक्षा नहीं है, जो भारत को दीर्घकालिक निवेश के लिए चाहिए।
आईएमईसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
आईएमईसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि अपनी विश्वसनीयता और दीर्घकालिक स्थिरता साबित करना भी है। भारत और उसके साझेदार देशों के लिए यह जरूरी होगा कि वे ऐसा आर्थिक ढांचा तैयार करें, जो पारदर्शिता, साझा नियंत्रण और संतुलित भागीदारी पर आधारित हो। इससे एक सुरक्षित और जोखिम-मुक्त वातावरण तैयार किया जा सकेगा, जो किसी एक देश पर निर्भर न हो।

