नई दिल्ली,
एशियाई विकास बैंक (ADB) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत आने वाले वर्षों में एशिया-प्रशांत क्षेत्र और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से आगे निकल सकता है, जबकि पूरे क्षेत्र में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी होने का अनुमान जताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विकासशील एशिया और प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि वर्ष 2026 और 2027 में घटकर 5.1 प्रतिशत रह सकती है, जो पिछले वर्ष 5.4 प्रतिशत थी। इस गिरावट के पीछे वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार से जुड़ी अनिश्चितता को प्रमुख कारण बताया गया है। इसके विपरीत भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार भारत की वृद्धि दर वर्ष 2026 में 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो वर्ष 2027 में बढ़कर 7.3 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह मजबूती मुख्य रूप से देश के भीतर उपभोग मांग के लगातार मजबूत बने रहने के कारण है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अधिकांश देशों में इस वर्ष और अगले वर्ष आर्थिक वृद्धि का परिदृश्य कमजोर हो सकता है, लेकिन भारत इस स्थिति में भी अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करेगा। एडीबी ने यह भी कहा कि यह क्षेत्र वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद मजबूत आधार के साथ आगे बढ़ रहा है। घरेलू मांग में स्थिरता, रोजगार बाजार की मजबूती और सार्वजनिक बुनियादी ढांचा खर्च में वृद्धि इसके प्रमुख सहायक कारक हैं। हालांकि, जोखिम अभी भी नीचे की ओर बने हुए हैं, जिससे आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार चीन की आर्थिक वृद्धि में भी गिरावट का अनुमान है। चालू वर्ष में यह घटकर 4.6 प्रतिशत और अगले वर्ष 4.5 प्रतिशत रह सकती है, जबकि पिछले वर्ष यह 5 प्रतिशत थी। चीन के संपत्ति बाजार में कमजोरी और निर्यात में धीमी बढ़त इसके प्रमुख कारण बताए गए हैं।
एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क ने कहा कि मध्य पूर्व में लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष ऊर्जा और खाद्य कीमतों को बढ़ा सकता है, जिससे क्षेत्र की आर्थिक स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा, वैश्विक व्यापार नीतियों में लगातार उतार-चढ़ाव भी आर्थिक वृद्धि के लिए चुनौती बना हुआ है। हालांकि इन चुनौतियों के बावजूद, निजी उपभोग की मजबूती और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े उत्पादों की बढ़ती मांग क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को कुछ हद तक सहारा दे सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि निकट भविष्य में तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं, लेकिन यदि भू-राजनीतिक तनाव कम होता है तो धीरे-धीरे स्थिरता आ सकती है।

