Mumbai,
भारत की आर्थिक वृद्धि रफ्तार मजबूत बनी हुई है और अर्थव्यवस्था में स्थिरता के संकेत मिल रहे हैं। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि पूरे वित्त वर्ष के लिए 7.6 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि इस मजबूत प्रदर्शन के पीछे निजी खपत और विनिर्माण क्षेत्र का बड़ा योगदान रहा है। निजी खपत में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, वहीं विनिर्माण क्षेत्र में 13.3 प्रतिशत की तेज बढ़त दर्ज की गई है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिली है। प्रभुदास लीलाधर समूह की संपत्ति प्रबंधन इकाई की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति में बाधा और मौद्रिक नीति को लेकर अनिश्चितता के कारण बाजारों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इसके बावजूद भारतीय शेयर बाजार अपेक्षाकृत स्थिर बने रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मजबूत घरेलू आर्थिक आधार, पर्याप्त तरलता और संस्थागत निवेशकों की लगातार भागीदारी ने भारतीय बाजार को सहारा दिया है। इन कारकों के चलते भारत पर भू-राजनीतिक तनावों का प्रभाव सीमित रहा है।
हालांकि, रिपोर्ट में चेतावनी भी दी गई है कि आने वाले समय में कुछ जोखिम आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, कमजोर रुपया, वैश्विक वृद्धि में सुस्ती, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और सख्त वित्तीय परिस्थितियां मिलकर राजकोषीय घाटे को बढ़ा सकती हैं और आर्थिक वृद्धि को धीमा कर सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक परिदृश्य अनिश्चितता से भरा हुआ है और तरलता की कमी की स्थिति बन रही है। ऊर्जा क्षेत्र में लगातार व्यवधान और भू-राजनीतिक जोखिम इसके प्रमुख कारण हैं। ऊंची कच्चे तेल की कीमतें महंगाई को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रख सकती हैं, जिससे ब्याज दरों पर दबाव बना रहेगा और इससे आय, वित्तीय संतुलन और मुद्रा स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
ऐसे माहौल में निवेश के लिए सतर्क रणनीति अपनाने की सलाह दी गई है। बड़े आकार की कंपनियों में निवेश, साथ ही मजबूत मूल्य, गुणवत्ता और कम उतार-चढ़ाव वाले विकल्प अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जा रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी उम्मीद जताई गई है कि भारत और अमेरिका के बीच शुल्क में कमी, भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते में प्रगति और बजट 2026 के तहत 12.2 लाख करोड़ रुपये के बुनियादी ढांचा निवेश से निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। इससे नए अवसर खुलेंगे और देश में पूंजीगत व्यय चक्र को गति मिलेगी। महंगाई के मोर्चे पर स्थिति संतुलित बनी हुई है और यह भारतीय रिजर्व बैंक की निर्धारित सीमा के भीतर है, जिससे नीतिगत निर्णय लेने में लचीलापन बना हुआ है।




