भारत में इन दिनों दुनिया की सबसे बड़ी जनगणना की प्रक्रिया चल रही है। कोविड-19 के कारण 2021 की जनगणना टाल दी गई थी, लेकिन अब यह प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल रूप से संचालित हो रही है। किसी भी देश के आर्थिक विकास के लिए जनगणना का होना महत्ती आवश्यकता बन गई है। सरकार भी दीर्घकालिक आर्थिक योजनाएं इसी डेटा के विश्लेषण के आधार पर तैयार करती है। यूं कहा जाए जनगणना किसी देश या देश के एक सुपरिभाषित हिस्से के सभी व्यक्तियों के एक विशिष्ट समय पर जनसांख्यिकीय, आर्थिक और सामाजिक डेटा एकत्र करने, उसके संकलन, विश्लेषण और प्रसारित करने की प्रक्रिया है। फिलहाल जनगणना के नवीनतम आंकड़ों और अनुमानों के अनुसार भारत की आबादी 1.47 बिलियन यानि 147.5 करोड़ को पार कर चुकी है। भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। भारत एक युवा देश है, जिसकी औसत आयु करीब 29 वर्ष है। देश की लगभग 70 फीसदी आबादी कार्यशील है। देश की लगभग 36 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्रों में निवास करती है। १6वीं जनगणना में पहली बार डिजिटल माध्यम से स्वयं-गणना का विकल्प शामिल किया गया है। साथ ही इसमें विस्तृत सामाजिक-आर्थिक स्थिति और जाति आधारित गणना भी हो रही है। जनगणना केवल लोगों की गिनती करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक और सामाजिक विकास का मुख्य आधार है। अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है यानि जनगणना बताती है कि किस क्षेत्र में कितने लोग रहते हैं और उनकी जरूरतें क्या हैं। इसके आधार पर सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, और बुनियादी ढांचे के लिए बजट आवंटित करती है। सटीक आंकड़ों से क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने में मदद मिलती है। जनगणना से कार्यशील जनसंख्या और कौशल का सही अनुमान लगता है। इसके जरिए सरकार यह तय कर पाती है कि देश में कितने रोजगार सृजित करने की आवश्यकता है और युवाओं को किस प्रकार के कौशल प्रशिक्षण की जरूरत है। यह शहरीकरण और आर्थिक औपचारिकरण के स्तर को दर्शाती है, जिससे सरकार को कर का दायरा बढ़ाने और राजस्व बढ़ाने में सहायता मिलती है। वहीं सतत विकास व संसाधनों पर जनसंख्या के दबाव को समझने के लिए जनगणना आवश्यक है।

