New Delhi,
भारत में कर्ज वृद्धि ने वित्त वर्ष 2026 में तेज गति पकड़ी है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में कुल कर्ज प्रवाह में 61 प्रतिशत की मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसका मुख्य कारण खुदरा ग्राहकों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) की बढ़ती मांग रही। रिपोर्ट में बताया गया कि वित्त वर्ष 2026 में कुल कर्ज प्रवाह बढ़कर लगभग 25.1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो कि जमा संग्रहण के 26.1 लाख करोड़ रुपये के लगभग बराबर है। यह दर्शाता है कि बैंकिंग प्रणाली में कर्ज और जमा के बीच संतुलन बना हुआ है, हालांकि कुछ दबाव भी देखने को मिल रहा है।
खुदरा और एमएसएमई क्षेत्र बने प्रमुख आधार
कर्ज वृद्धि को सबसे अधिक बल खुदरा, एमएसएमई और आधारभूत ढांचा क्षेत्रों से मिला है। विशेष रूप से व्यक्तिगत कर्ज की हिस्सेदारी पिछले कुछ वर्षों में 29 प्रतिशत से बढ़कर 33 प्रतिशत हो गई है। इसके पीछे कर राहत उपायों और जीएसटी से जुड़े लाभों का योगदान रहा है, जिससे घरों की आय में सुधार हुआ। इस श्रेणी में वाहन कर्ज सबसे बड़ा कारक बनकर उभरा है और इसने वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही से आवास कर्ज को भी पीछे छोड़ दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, असुरक्षित कर्ज की वृद्धि धीमी पड़ने के कारण अब सुरक्षित कर्ज की ओर झुकाव बढ़ रहा है। इससे बैंकिंग प्रणाली में जोखिम संतुलन बेहतर होने की उम्मीद है। हालांकि कर्ज तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन जमा वृद्धि वित्त वर्ष 2024 से धीमी पड़ गई है। इससे बैंकिंग प्रणाली की तरलता पर कुछ दबाव बना है। कर्ज-जमा अनुपात बढ़कर 82.4 प्रतिशत हो गया है, जो पिछले एक दशक का उच्चतम स्तर है।
औद्योगिक कर्ज में सुधार, एमएसएमई का योगदान अहम
रिपोर्ट में औद्योगिक कर्ज में सुधार की भी बात कही गई है, जिसमें एमएसएमई क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह क्षेत्र अब कुल औद्योगिक कर्ज का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बन चुका है। सरकारी समर्थन, जैसे कर्ज गारंटी योजनाएं और एमएसएमई की संशोधित परिभाषा, ने इस क्षेत्र की वृद्धि को मजबूती दी है। वर्ष के दौरान सूक्ष्म और लघु उद्यमों ने 2.38 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज लिया, जबकि मध्यम उद्यमों ने 63 हजार करोड़ रुपये का योगदान दिया।
आने वाले समय में चुनौतियां संभव
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वित्त वर्ष 2027 में कर्ज वृद्धि की रफ्तार धीमी हो सकती है। इसके पीछे कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, कमजोर निर्यात और बढ़ती खाद्य महंगाई जैसे कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। इसके अलावा, जीएसटी से मिलने वाले लाभों का असर कम होने से भी कर्ज की मांग पर असर पड़ सकता है। ऐसे में आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है।

