नई दिल्ली,
बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच भारत और कनाडा के बीच व्यापार वार्ता एक बार फिर अहम होती जा रही है। पहले दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव के कारण कई बार बातचीत पटरी से उतर गई थी, लेकिन इस वर्ष मार्च में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा के दौरान वार्ता दोबारा शुरू होने से आर्थिक संबंधों को मजबूत करने का नया अवसर मिला है। भारत के पूर्व उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा ने एक लेख में कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी की संभावनाएं बढ़ी हैं। उन्होंने बताया कि कनाडा की अर्थव्यवस्था काफी हद तक संयुक्त राज्य अमेरिका पर निर्भर है, जो अब एक रणनीतिक चुनौती बनती जा रही है। ऐसे में कनाडा के लिए आर्थिक विविधीकरण आवश्यक हो गया है और भारत इस दिशा में एक महत्वपूर्ण साझेदार बन सकता है।
चरणबद्ध समझौते की दिशा में बढ़ते कदम
वर्मा के अनुसार, वर्ष 2022 में प्रारंभिक प्रगति व्यापार समझौते की दिशा में जो बदलाव हुआ, वह व्यवहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह आगे चलकर व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते का आधार बन सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस तरह का समझौता एक बार में पूरा होने के बजाय चरणों में विकसित होना चाहिए। पहले चरण में उन बिंदुओं को मजबूत किया जा सकता है जिन पर पहले से सहमति बन चुकी है। इसके बाद निवेश संरक्षण, डिजिटल व्यापार और नियामकीय सहयोग जैसे जटिल विषयों को धीरे-धीरे शामिल किया जा सकता है। कृषि, बौद्धिक संपदा और सरकारी खरीद जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को बाद के चरणों में लिया जाना अधिक उचित रहेगा।
व्यापार और निवेश में बढ़ सकती है तेजी
दोनों देशों के बीच वस्तु व्यापार अभी सीमित है, लेकिन बेहतर बाजार पहुंच और सरल नियमों के माध्यम से इसमें वृद्धि संभव है। वहीं सेवा क्षेत्र, जो पहले से मजबूत है, उसमें सूचना प्रौद्योगिकी, शिक्षा और पेशेवर सेवाओं के क्षेत्र में और विस्तार हो सकता है। लेख में यह भी बताया गया है कि कनाडा के पेंशन फंड और संस्थागत निवेशकों ने भारत के आधारभूत ढांचा और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में बड़ा निवेश किया है। वहीं भारतीय कंपनियां भी कनाडा के सेवा क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ा रही हैं। यह निवेश संबंध दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। हालांकि, निवेश को स्थिर बनाए रखने के लिए कर व्यवस्था और लाभ वापसी से जुड़े नियमों को अधिक स्पष्ट और भरोसेमंद बनाना जरूरी होगा।
राजनीतिक प्रभाव से बचाने की जरूरत
पूर्व उच्चायुक्त ने यह भी कहा कि इस प्रकार के समझौते को राजनीतिक तनाव से प्रभावित होने से बचाना आवश्यक है। इसके लिए मजबूत विवाद समाधान प्रणाली, नियमित समीक्षा प्रक्रिया और संस्थागत ढांचा तैयार करना जरूरी होगा, ताकि किसी भी परिस्थिति में आर्थिक सहयोग जारी रह सके। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ाया जाए, जिससे व्यापारिक हितधारक दोनों देशों के बीच स्थिरता बनाए रखने में सहयोग कर सकें।




