Wednesday, July 1, 2026 |
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बांग्लादेश के परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर विशेषज्ञ की चेतावनी, सुरक्षा और तकनीकी क्षमता पर उठे सवाल

by Business Remedies
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Bangladesh's Rooppur Nuclear Power Plant and safety preparedness

नई दिल्ली,

बांग्लादेश अपने पहले परमाणु ऊर्जा संयंत्र ‘रूपपुर’ के पहले इकाई में आगामी 7 अप्रैल से ईंधन लोडिंग शुरू करने जा रहा है, जिससे बिजली उत्पादन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठेगा। लेकिन इस बीच ढाका विश्वविद्यालय के भौतिकी प्रोफेसर डॉ. कमरुल हसन मामून ने इस परियोजना को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं।

ढाका से प्रकाशित एक रिपोर्ट में प्रोफेसर मामून ने कहा कि परमाणु रिएक्टर में ईंधन लोडिंग उसकी पूरी प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील और नाजुक चरण होता है। इस दौरान सुरक्षा, विकिरण नियंत्रण और तकनीकी विश्वसनीयता सर्वोच्च प्राथमिकता होती है, क्योंकि छोटी सी चूक भी बड़े और दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि इतिहास में चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी परमाणु दुर्घटनाएं इस बात का उदाहरण हैं कि दुर्लभ लेकिन गंभीर विफलताएं किस प्रकार समाज और पर्यावरण को दशकों तक प्रभावित कर सकती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि परमाणु ऊर्जा के लिए उच्चतम स्तर की सुरक्षा और पारदर्शिता आवश्यक है। प्रोफेसर मामून ने यह भी कहा कि बांग्लादेश ने इस अत्यंत संवेदनशील परियोजना को मुख्य रूप से विदेशी ऋण, विदेशी कंपनियों और विदेशी तकनीकी विशेषज्ञता के सहारे आगे बढ़ाया है, जो चिंता का विषय है। सामान्यतः कोई भी देश परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले अपने वैज्ञानिक और तकनीकी ढांचे को मजबूत करता है।

उन्होंने कहा कि सफल परमाणु कार्यक्रमों में देश पहले अपने वैज्ञानिकों, अभियंताओं और नियामक विशेषज्ञों की मजबूत पीढ़ी तैयार करता है। यदि ऐसा आधार नहीं होता, तो परियोजना केवल आयातित तकनीक बनकर रह जाती है, न कि राष्ट्रीय क्षमता का हिस्सा। प्रोफेसर ने यह भी बताया कि एक परमाणु रिएक्टर बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करता है, जो आमतौर पर लगभग 1000 मेगावाट या उससे अधिक होती है। इतनी बड़ी बिजली को यदि कमजोर या अस्थिर राष्ट्रीय ग्रिड में जोड़ा जाए तो इससे गंभीर तकनीकी चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं। बिजली ग्रिड में आपूर्ति और मांग के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद आवश्यक होता है। इसमें आवृत्ति, वोल्टेज और लोड का तालमेल जरूरी है। छोटी सी गड़बड़ी भी पूरे तंत्र को प्रभावित कर सकती है और व्यापक बिजली बाधित हो सकती है। उन्होंने कहा कि परमाणु संयंत्र गैस या जलविद्युत संयंत्रों की तरह तुरंत उत्पादन कम या ज्यादा नहीं कर सकते, जिससे ग्रिड संतुलन बनाए रखना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे में विभिन्न ऊर्जा स्रोतों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होता है।

इसके अलावा, उन्होंने देशभर में बिजली वितरण के लिए मजबूत प्रसारण ढांचे की आवश्यकता पर भी जोर दिया। यदि उच्च क्षमता वाली लंबी दूरी की बिजली लाइनों का पर्याप्त विकास नहीं हुआ, तो उत्पादन के बावजूद बिजली का प्रभावी उपयोग संभव नहीं होगा। प्रोफेसर मामून ने कहा कि किसी भी बड़े वैज्ञानिक प्रयास की सफलता केवल अल्पकालिक प्रशिक्षण से नहीं आती, बल्कि इसके लिए विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और मजबूत वैज्ञानिक संस्कृति का विकास जरूरी होता है।

उन्होंने भारत के परमाणु कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए बताया कि होमी जहांगीर भाभा जैसे वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र की नींव रखी। उनके बाद विक्रम साराभाई और आर. चिदंबरम जैसे वैज्ञानिकों ने देश को वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से मजबूत बनाया। अंत में उन्होंने कहा कि रूपपुर परमाणु संयंत्र की वास्तविक सफलता केवल इसके संचालन में नहीं, बल्कि इस बात में होगी कि बांग्लादेश क्या इसके साथ एक मजबूत वैज्ञानिक और तकनीकी ढांचा विकसित कर पाता है या नहीं। यदि देश इस चुनौती को पूरा करता है, तो परमाणु ऊर्जा उसकी दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा का मजबूत आधार बन सकती है।



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