किसी भी देश की जनगणना से ही वहां की आर्थिक स्थिति और रोजगार का आंकलन किया जा सकता है। यूं कहे की देश में कितने अमीर व गरीब या कितने मध्यमवर्ग के लोग रहते है का पता चलता है। मौर्य प्रशासन में जनगणना एक नियमित प्रक्रिया थी। मौर्य साम्राज्य में व्यापारियों, कृषकों, लुहारों, कुम्हारों, बढ़इयों आदि जैसे लोगों के विभिन्न वर्गों की गणना करने के लिए ग्रामीण अधिकारी और नगरपालिका अधिकारी जिम्मेदार थे। इससे देश के सभी व्यक्तियों से संबंधित जनसांख्यिकीय, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक डेटा एकत्र किया जा सकता है। जनगणना के माध्यम से घरों, परिवारों को उपलब्ध सुविधाओं, जनसंख्या की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विशेषताएं भी एकत्र की जाती है। अब भारत सरकार के गृह मंत्रालय के रजिस्ट्रार जनरल तथा जनगणना आयुक्त पर जिम्मेदारी है कि वह जनगणना हर 10 वर्ष के बाद करवाए। भारत में कोविड-19 महामारी के कारण वर्ष, 2021 में होने वाली जनगणना टाल दी गई थी। फिर वर्ष,२०२४ में जनगणना करवाने की प्लानिंग बनी, लेकिन दुबारा से इसे स्थगित कर दिया। वहीं वर्ष, 2024-25 के बजट में जनगणना के लिए भारी कटौती के बीच केवल1,309 करोड़ आवंटित किए। अब अगली जनगणना वर्ष, 2025 में शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है। जनगणना नहीं होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, पर जनगणना में देरी को लेकर कई अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं ने चिंता व्यक्त की है। इसकी वजह से विभिन्न सांख्यिकीय सर्वेक्षणों की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। जनगणना में देरी की वजह से सरकारी एजेंसियां वर्ष, 2011 की जनगणना से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर नीतियां बना रही हैं। जो की सही मायने में उचित नहीं कही जा सकती है,क्योंकि कई योजनाएं इससे प्रभावित हो रही है। जब जनगणना के आंकड़े सही नहीं होंगे, तो धरातल पर योजनाएं भी सही रूप में नहीं आ पाएगी। इसलिए जरूरी है कि जनगणना को सही समय पर करवाया जाए।

