पिछले रक्षा खरीद मैनुअल (डीपीएम) के 16 साल बाद आ रहे नए डीपीएम 2025 में उल्लेखनीय प्रगति नजर आ रही है। यह रक्षा मंत्रालय की खरीद प्रक्रिया को व्यवस्थित और तर्कसंगत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसकी अनुमानित लागत वर्तमान वित्त वर्ष में करीब एक लाख करोड़ रुपये है। नया मैनुअल सशस्त्र बलों के सही ढंग से काम करने के लिए जरूरी वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करने के लिए एक व्यावहारिक और सक्षम प्रणाली प्रस्तुत करता है। ऐसा करके उन बार-बार सामने आने वाली चिंताओं को हल करने की कोशिश की गई है जो रक्षा क्षेत्र की कंपनियों द्वारा जताई गई थीं। मैनुअल के 2025 के संस्करण में इन मुद्दों को संबोधित किया गया है और साथ ही प्रतिस्पर्धी आत्मनिर्भरता के अहम लक्ष्य को भी बढ़ावा देने का प्रयास किया गया है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए डीपीएम 2025 में पूर्व निर्धारित क्षतिपूर्ति को काफी हद तक कम कर दिया गया है। यह वह राशि है जो किसी अनुबंधकर्ता को रक्षा मंत्रालय को उस समय चुकानी पड़ती है जब वह अनुबंध को भंग करता है। इसमें विकास चरण के दौरान पूर्व निर्धारित क्षतिपूर्ति को समाप्त कर दिया गया है और प्रोटोटाइप यानी नमूना विकास के चरण के बाद के लिए न्यूनतम 0.1 फीसदी की दर निर्धारित की गई है। इतना ही नहीं इसे अधिकतम 5 फीसदी पर सीमित कर दिया गया है। अत्यधिक देरी होने पर इसे 10 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। मैनुअल में डेवलपर्स के लिए हालात को स्थिर बनाने का प्रयास भी किया गया है। इसके तहत पांच वर्ष तक ऑर्डर की गारंटी देना शामिल है, जिसे कुछ मामलों में बढ़ाकर 10 वर्ष तक किया जा सकता है। डीपीएम 2025 में मरम्मत, दोबारा फिटिंग और रखरखाव के लिए 15 फीसदी के अग्रिम प्रावधान के अलावा सीमित निविदा की राशि को डीपीएम 2009 के 25 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया गया है। असाधारण हालात में यह राशि इससे भी अधिक हो सकती है। एक अन्य अहम बात यह है कि डीपीएम 2025 में बोली खोलने के पहले रक्षा क्षेत्र के सरकारी उपक्रम से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता को भी समाप्त कर दिया गया है। अब जबकि सभी निविदाएं प्रतिस्पर्धी आधार पर प्रदान की जाएंगी तो रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में एक जीवंत निजी क्षेत्र के सामने आने की संभावनाएं भी काफी बढ़ गई हैं।

