Saturday, July 4, 2026 |
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दुनिया का हर छठा व्यक्ति है अकेलेपन का शिकार

by Business Remedies
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विश्व स्वास्थ्य संगठन की वह रिपोर्ट चौंकाती है कि दुनिया में हर छठा इंसान अकेला है। दुनिया के करोड़ों लोग टूटे रिश्तों व संवाद से विलग होकर नितांत खामोशी का जीवन जी रहे हैं। सही मायनों में इंसान के भीतर की ये खामोशी लाखों जिंदगियां लील रही है। विडंबना यह है कि इस संकट का सबसे ज्यादा शिकार युवा हो रहे हैं। निश्चय ही जीवन की जटिलताएं बढ़ी हैं। कई तरह की चुनौतियां सामने हैं। पीढिय़ों के बीच का अंतराल विज्ञान व तकनीक के विस्तार के साथ तेज हुआ है। सोच के भौतिकवादी होने से हमारी आकांक्षाओं का आसमान ऊंचा हुआ है, लेकिन यथार्थ से साम्य न बैठा पाने से हताशा व अवसाद का विस्तार हो रहा है। जिसके चलते निराशा हमें एकाकीपन की ओर धकेल देती है। कहने को तो सोशल मीडिया का क्रांतिकारी ढंग से विस्तार हो रहा है, लेकिन इसकी हकीकत आभासी है। हो सकता है किसी व्यक्ति के हजारों मित्र सोशल मीडिया मंचों पर हों, लेकिन यथार्थ के जीवन में व्यक्ति बिल्कुल एकाकी होता है। आभासी मित्रों का कृत्रिम संवाद हमारी जिंदगी के सवालों का समाधान नहीं दे सकता। निश्चित रूप से कृत्रिम रिश्ते हमारे वास्तविक रिश्तों के ताने-बाने को मजबूत नहीं कर सकते। दरअसल, लोगों में यह आम धारणा बलवती हुई है कि जिसके पास पैसा है तो वह सबकुछ कर सकता है। जिसके चलते उसने आस-पड़ोस से लेकर कार्यस्थल पर सीमित पहुंच बनायी है। यही वजह है कि हमारे इर्द-गिर्द की भीड़ और ऑनलाइन जिंदगी के हजारों मित्रों के बावजूद व्यक्ति एकांत में जीने के लिये अभिशप्त है। सही बात ये है कि लोग किसी के कष्ट और मन की पीड़ा के प्रति संवेदनशील व्यवहार नहीं करते। हर तरफ कृत्रिमताओं का बोलबाला है। हमारे मिलने-जुलने वाले त्योहार भी अब दिखावे व कृत्रिम सौगातों की भेंट चढ़ गए हैं। हमें उन कारकों पर मंथन करना होगा, जिनके चलते व्यक्ति निजी जीवन में लगातार एकाकी होता जा रहा है।



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