Thursday, March 5, 2026 |
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दर्द से डरने की नहीं, समझदारी से इलाज कराने की जरूरत है: डॉ. अरविंद जागा

by Business Remedies
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चारू भाटिया | बिजनेस रेमेडीज/जयपुर। आज की तेज़-रफ्तार और स्क्रीन-केंद्रित जीवनशैली में रीढ़ और ऑर्थोपेडिक समस्याएं छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर आयु वर्ग को प्रभावित कर रही हैं। जयपुर स्थित Jaga Physiotherapy and Neuro Rehabilitation Centre के संस्थापक और प्रसिद्ध फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. अरविंद जागा देश-विदेश से आने वाले मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज कर चुके हैं। इस विशेष बातचीत में वे बताते हैं कि रीढ़ से जुड़ी समस्याएं क्यों बढ़ रही हैं, व्यक्तिगत रिहैबिलिटेशन प्लान किस तरह मरीजों को फिर से चलने-फिरने और आत्मविश्वास लौटाने में मदद करते हैं, और आधुनिक थेरेपी इलाज की दिशा कैसे बदल रही है।

प्रश्न: आपने जयपुर ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों और विदेशों से आए कई मरीजों का इलाज किया है। आपके अनुभव में लोग रीढ़ की समस्याओं को कैसे देखते हैं और वे इससे क्यों पीड़ित होते हैं?

उत्तर: इसका सबसे बड़ा कारण जीवनशैली है। लगभग 48 प्रतिशत लोग अपने जीवन में कम से कम एक बार पीठ दर्द का अनुभव करते हैं और गलत पोस्चर के कारण यह समस्या लगातार बढ़ रही है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, व्यायाम की कमी, शारीरिक गतिविधि का अभाव और असंतुलित आहार इसके प्रमुख कारण हैं।
इसके अलावा विटामिन डी और बी12 जैसे आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हड्डियों और नसों को कमजोर कर देती है, जिससे रीढ़ से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
चिंताजनक बात यह है कि स्लिप डिस्क जैसी समस्याएं अब कम उम्र में सामने आ रही हैं। पहले यह समस्या अधिकतर तीस की उम्र के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन अब 10-12 वर्ष के बच्चों में भी इसके मामले मिल रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण अत्यधिक स्क्रीन टाइम और भारी स्कूल बैग हैं। अध्ययनों के अनुसार, स्कूल बैग का वजन बच्चे के शरीर के वजन का 7-10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, लेकिन इसका पालन बहुत कम होता है।

वयस्कों में मोटापा भी एक बड़ा कारण है। निष्क्रिय जीवनशैली से वजन बढ़ता है और फिर अचानक जिम में अत्यधिक मेहनत करने से मांसपेशियों और रीढ़ पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसके साथ ही तकनीक-आधारित कार्य संस्कृति, जिसमें कर्मचारी घंटों स्क्रीन के सामने बैठकर काम करते हैं, सर्वाइकल और पोस्चर संबंधी समस्याओं को बढ़ावा देती है। डिहाइड्रेशन भी एक अनदेखा कारण है, क्योंकि लंबे समय तक बैठने से प्यास का एहसास कम हो जाता है, जिसका सीधा असर मांसपेशियों और जोड़ों पर पड़ता है।

प्रश्न: आप मरीज की स्थिति का आकलन कैसे करते हैं और व्यक्तिगत रिहैबिलिटेशन प्लान कैसे तैयार करते हैं, खासकर जब आप दुनिया भर के मरीजों का इलाज करते हैं?

उत्तर: हर मरीज अलग होता है, इसलिए पर्सनलाइजेशन बेहद जरूरी है। हाल ही में मैंने लंदन के एक डॉक्टर का इलाज किया, जो वहां एक अस्पताल में इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के प्रमुख हैं। बर्फ पर फिसलने के कारण उन्हें घुटने की मूवमेंट वापस पाने के लिए फिजियोथेरेपी की जरूरत थी।
हम सबसे पहले मरीज की उम्र, शारीरिक स्थिति, मूवमेंट की रेंज, दर्द के स्तर और पेशे से जुड़े जोखिमों का आकलन करते हैं। इसके बाद ही इलाज की योजना बनाई जाती है। रीढ़ से जुड़ी समस्याएं, जैसे स्लिप डिस्क, चार चरणों में होती हैं और सही चरण की पहचान बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसी तरह अलग-अलग मस्कुलोस्केलेटल और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के लिए अलग दृष्टिकोण अपनाया जाता है। विस्तृत मूल्यांकन से यह सुनिश्चित होता है कि मरीज को सबसे प्रभावी और उपयुक्त थेरेपी मिले।

प्रश्न: आप किन थेरेपी का सबसे अधिक उपयोग करते हैं और क्यों?

उत्तर: हम रोबोटिक फिजियोथेरेपी, रोबोटिक स्पाइनल डीकंप्रेशन, मैग्नेटो थेरेपी और मैनुअल थेरेपी जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। फिजियोथेरेपी और एक्सरसाइज हमारे इलाज की बुनियाद हैं, जबकि गंभीर मामलों में उन्नत तकनीकों को जोड़ा जाता है।
हम अल्ट्रासाउंड और स्कैन एनालिसिस के जरिए यह तय करते हैं कि किस मरीज के लिए कौन-सी थेरेपी सबसे प्रभावी होगी। हमारा लक्ष्य दर्द को कम करने के साथ-साथ शरीर को प्राकृतिक रूप से ठीक होने का अवसर देना है। इसी कंज़र्वेटिव और व्यक्तिगत इलाज के जरिए हम अब तक लगभग एक लाख रीढ़ की सर्जरी रोकने में सफल रहे हैं।

प्रश्न: रिहैब के दौरान मरीज की प्रगति को आप कैसे मॉनिटर करते हैं?

उत्तर: निगरानी एक निरंतर प्रक्रिया है। शुरुआती जांच से लेकर हर सत्र तक मरीज की प्रगति पर बारीकी से नजर रखी जाती है। हल्के मामलों में रिकवरी एक सप्ताह में हो सकती है, जबकि गंभीर मामलों में एक महीने या उससे अधिक समय लग सकता है। दो एचओडी के नेतृत्व में फिजियोथेरेपिस्ट की समर्पित टीम लगातार मरीजों की प्रगति का रिकॉर्ड रखती है।

प्रश्न: आप मरीजों को घर पर एक्सरसाइज और जीवनशैली में बदलाव के लिए कैसे जागरूक करते हैं?

उत्तर: मैं मरीजों को रोज़ कम से कम एक घंटा व्यायाम के लिए समय निकालने की सलाह देता हूं। पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार और सही आराम भी उतने ही जरूरी हैं। मैं गैर-प्रमाणित लोगों से इलाज कराने के खिलाफ चेतावनी देता हूं, क्योंकि इससे समस्या और गंभीर हो सकती है।
चोट लगने के बाद शुरुआती 48 घंटे तक ठंडी सिकाई करनी चाहिए ताकि सूजन नियंत्रित रहे। इस दौरान गर्म सिकाई और मालिश से बचना चाहिए। सही जानकारी और सही देखभाल से रिकवरी तेज होती है और भविष्य की जटिलताओं से बचा जा सकता है।

प्रश्न: अपनी फेलोशिप के दौरान किए गए शोध के बारे में बताइए।

उत्तर: मेरा शोध एक पर्सनलाइज्ड थेरेपी सिस्टम विकसित करने पर केंद्रित है, जिसमें मैनुअल थेरेपी और स्पाइनल डीकंप्रेशन तकनीकों का संयोजन किया गया है। इसका उद्देश्य बिना सर्जरी के बेहतर रिकवरी और मरीज की गतिशीलता में सुधार लाना है।

प्रश्न: अपने अस्पताल में मेंटरशिप और लीडरशिप को आप कैसे देखते हैं?

उत्तर: हमारे यहां ऑर्थो और न्यूरो दो मुख्य विभाग हैं, जिनका नेतृत्व अलग-अलग एचओडी करते हैं। उनके अंतर्गत 27 प्रमाणित थेरेपिस्ट कार्यरत हैं। यह संरचित व्यवस्था कामकाज को सुचारू बनाती है और मरीजों को निरंतर और गुणवत्तापूर्ण देखभाल सुनिश्चित करती है।

प्रश्न: न्यूरोप्लास्टिसिटी के सिद्धांत क्या हैं और आप इन्हें क्लिनिकली कैसे लागू करते हैं?

उत्तर: न्यूरोप्लास्टिसिटी मस्तिष्क की वह क्षमता है, जिसके माध्यम से वह खुद को पुनर्गठित करता है और नई न्यूरल कनेक्शन्स बनाता है। क्लिनिकली हम दोहराव वाली एक्सरसाइज और टार्गेटेड थेरेपी के जरिए नर्वस सिस्टम को दोबारा प्रशिक्षित करते हैं, जिससे न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जूझ रहे मरीजों को कार्यक्षमता वापस पाने में मदद मिलती है।

प्रश्न: रिहैब के दौरान डर, चिंता या नकारात्मक भावनाओं से जूझ रहे मरीजों को आप कैसे संभालते हैं?

उत्तर: सबसे पहले मरीज के भीतर भरोसा और आत्मविश्वास पैदा करना जरूरी होता है। मैं उनकी बात ध्यान से सुनता हूं, भावनाओं को समझता हूं और सहानुभूति के साथ संवाद करता हूं। मैं अपनी राय थोपने के बजाय मरीज के नजरिए को समझने पर जोर देता हूं। मानसिक सहयोग उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शारीरिक इलाज, क्योंकि सकारात्मक मानसिक स्थिति ही तेज़ और स्थायी रिकवरी की नींव होती है।



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