नई दिल्ली: भारत में ₹.65,000 करोड़ से अधिक मूल्य की कोयला गैसीकरण परियोजनाओं पर वर्तमान में काम चल रहा है। यह दर्शाता है कि कोयले को रसायनों, ईंधन और औद्योगिक कच्चे माल में परिवर्तित करने की सरकार की महत्वाकांक्षी योजना अब केवल नीतिगत स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर भी तेजी से आगे बढ़ रही है। हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कोयला सचिव विक्रम देव दत्त ने कहा कि इस क्षेत्र को उद्योग जगत से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली है। उन्होंने बताया कि जनवरी 2024 में स्वीकृत ₹.8,500 करोड़ की प्रोत्साहन योजना के तहत पहले से ही 8 परियोजनाओं पर काम शुरू हो चुका है।
इन परियोजनाओं को कुल ₹.6,233 करोड़ की प्रोत्साहन सहायता प्रदान की गई है। ये परियोजनाएं संश्लेषित प्राकृतिक गैस, एथेनॉल, हाइड्रोजन, एसीटिक अम्ल, अमोनियम नाइट्रेट, प्रत्यक्ष अपचयित लौह आधारित इस्पात तथा टिकाऊ विमानन ईंधन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं। कोयला सचिव ने बताया कि सरकार ₹.37,500 करोड़ की बड़ी प्रोत्साहन योजना के लिए प्रस्ताव आमंत्रण दस्तावेज को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है। मसौदा दस्तावेज को पहले ही संबंधित पक्षों से सुझाव प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक किया जा चुका है।
कार्यक्रम में केंद्रीय कोयला मंत्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि महाराष्ट्र कोयला गैसीकरण क्षेत्र का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहा है। राज्य में पहले से ही 5 परियोजनाओं का विकास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी कोलफील्ड्स लिमिटेड के माध्यम से कोयले की उपलब्धता, मजबूत औद्योगिक ढांचा और नीतिगत सहयोग महाराष्ट्र को इस क्षेत्र का संभावित प्रमुख केंद्र बनाते हैं। वहीं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि राज्य सरकार इस क्षेत्र के लिए निवेश अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी बताया कि मुंबई का कोयला गैसीकरण प्रौद्योगिकी से ऐतिहासिक संबंध रहा है, जिससे भविष्य में इस क्षेत्र को और गति मिलने की संभावना है।
सरकार का अनुमान है कि कोयला गैसीकरण कार्यक्रम के माध्यम से लगभग 25 परियोजनाओं में ₹.2.5 लाख करोड़ से ₹.3 लाख करोड़ तक का निवेश आकर्षित होगा। इसके साथ ही वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले का गैसीकरण करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह कार्यक्रम भारत की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य उर्वरक, रसायन और ईंधन के आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू औद्योगिक क्षमता को मजबूत बनाना तथा देश की ऊर्जा सुरक्षा को और अधिक सशक्त करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं के सफल क्रियान्वयन से रोजगार सृजन, औद्योगिक विकास और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलेगा।

