हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी महात्मा गांधी की जयंती पर आज अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया जाएगा। यह दिन केवल एक महापुरुष को स्मरण करने का नहीं, बल्कि उनके द्वारा दिखाए गए सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का अवसर है। आज के दौर में इस दिवस की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है, जब दुनिया भर में युद्ध, आतंकवाद, आपसी द्वेष, नस्लीय भेदभाव और राजनीतिक संघर्ष बढ़ रहे हैं। आज का समय हथियारों की होड़ और आक्रामकता से त्रस्त है, ऐसे में शांति का संदेश ही मानवता को बचा सकता है। यह दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि वैचारिक मतभेदों को युद्ध से नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति से सुलझाया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस हमें यह अहसास कराता है कि स्थायी शांति और विकास का मार्ग केवल अहिंसा से होकर गुजरता है। यदि हमें एक सुरक्षित, समरस और खुशहाल भविष्य की नींव रखनी है, तो गांधी के विचारों को अपने आचरण में उतारना ही होगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून, 2007 को एक प्रस्ताव पारित करके 2 अक्टूबर को इस दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसका मुख्य उद्देश्य समाज, राष्ट्र और पूरी दुनिया में शिक्षा और जन-जागरूकता के माध्यम से अहिंसा के संदेश को फैलाना है। इस दिवस को मनाने के पीछे यह मूल भावना रही है कि संघर्षों, मतभेदों और युद्धों का समाधान हिंसा से नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण संवाद, आपसी सहिष्णुता और सद्भाव से ही संभव है। यह दिवस हमें सिखाता है कि अहिंसा कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। महात्मा गांधी ने यह सिद्ध किया था कि बिना हथियार उठाए भी बड़े से बड़े अन्याय और अत्याचार के खिलाफ डटकर खड़ा हुआ जा सकता है। इस दिन हमें अपने दैनिक जीवन में असहिष्णुता को त्यागकर धैर्य, करुणा और क्षमा के भाव को अपनाने की प्रेरणा लेनी चाहिए। हमारे विचार और आचरण में शांति होनी चाहिए, तभी हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस हमें याद दिलाता है कि शांति केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। इसकी शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार से होती है। यदि हम परिवार, समाज और कार्यस्थल पर सम्मान, करुणा और संवाद की संस्कृति विकसित करें, तो यही महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

