Wednesday, August 12, 2026 |
Home Business Remediesभारत की सौर ऊर्जा क्रांति बन सकती है उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए मिसाल: रिपोर्ट

भारत की सौर ऊर्जा क्रांति बन सकती है उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए मिसाल: रिपोर्ट

by Business Remedies
0 comments
India Solar Energy Expansion At Khavda Solar Park In Gujarat Renewable Energy Hub

New Delhi,

गुजरात के रण ऑफ कच्छ के सफेद नमक के रेगिस्तानों में तेजी से स्थापित किए जा रहे सौर पैनल इस क्षेत्र को दुनिया के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रों में बदल रहे हैं। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सौर ऊर्जा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति आने वाले वर्षों में अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी एक आदर्श मॉडल बन सकती है।

भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट लगभग 280 वर्ग मील क्षेत्र में फैला खावड़ा सौर पार्क वर्ष 2029 तक दुनिया की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना बनने की राह पर है। परियोजना पूरी होने के बाद यहां लगभग 6 करोड़ सौर पैनल स्थापित होंगे और 30 गीगावाट बिजली का उत्पादन किया जाएगा। यह उत्पादन ऑस्ट्रिया जैसे पूरे देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम होगा। रिपोर्ट के अनुसार, यह विशाल परियोजना भारत के सौर ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से बढ़ते निवेश और विस्तार को दर्शाती है। देश की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता पिछले कुछ वर्षों में औसतन 40 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ी है और मार्च में 150 गीगावाट के स्तर को पार कर गई। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह क्षमता लगभग दोगुनी हो जाएगी, जिससे बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के साथ-साथ जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता भी कम होगी।

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत दुनिया की पहली बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है जो मुख्य रूप से कोयले के बजाय सौर ऊर्जा के आधार पर औद्योगिकीकरण को गति देगा। यूनाइटेड किंगडम स्थित ऊर्जा शोध संस्था एम्बर के ऊर्जा रणनीतिकार किंग्समिल बॉन्ड के अनुसार, भारत विकास का ऐसा रास्ता अपना रहा है जो चीन और पश्चिमी देशों से अलग है। जहां चीन ने अपने औद्योगिक विकास की नींव कोयले पर रखी, वहीं भारत सौर ऊर्जा को आधार बनाकर आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का यह मॉडल उन विकासशील देशों के लिए प्रेरणा बन सकता है जो आर्थिक विकास तो चाहते हैं, लेकिन कार्बन उत्सर्जन में भारी वृद्धि से बचना चाहते हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक प्रगति के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि केवल एक दशक पहले तक भारत के ऊर्जा मिश्रण में सौर ऊर्जा की भूमिका काफी सीमित थी। उस समय सरकार औद्योगिक विकास को समर्थन देने के लिए कोयला उत्पादन को प्राथमिकता दे रही थी। हालांकि जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ती वैश्विक चिंताओं और सौर पैनलों की कीमतों में लगातार गिरावट ने देश की ऊर्जा नीति को धीरे-धीरे बदल दिया। वर्ष 2014 में सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2020 तक कोयला उत्पादन को दोगुना करने का लक्ष्य रखा था। भारत ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलनों में भी यह तर्क दिया था कि विकासशील देशों को गरीबी कम करने और आर्थिक विस्तार के लिए अभी जीवाश्म ईंधनों की आवश्यकता है।

लेकिन समय के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन की लागत कम होने और भारत में भरपूर धूप उपलब्ध होने के कारण ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव आया। ग्लासगो में आयोजित COP26 जलवायु सम्मेलन के बाद देश में सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना की गति और अधिक तेज हो गई। पिछले वर्ष पहली बार भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक रही। यह देश के स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, वर्तमान समय से लेकर वर्ष 2030 तक भारत की अतिरिक्त बिजली मांग का लगभग आधा हिस्सा सौर ऊर्जा के माध्यम से पूरा होने की संभावना है। वहीं लगभग एक-चौथाई अतिरिक्त मांग पवन ऊर्जा, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा जैसे कम-कार्बन स्रोतों से पूरी की जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान गति बनी रहती है तो भारत न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है, बल्कि ऊर्जा परिवर्तन के क्षेत्र में दुनिया के लिए एक सफल उदाहरण भी बन सकता है।



You may also like

Leave a Comment