किसानों की मांगों को लेकर काफी समय से आंदोलित है, लेकिन अभी तक इन पर सरकार की ओर से पुख्ता निर्णय नहीं लिया गया है। मांगों को लेकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि के किसानों की ओर से 9 अगस्त, 2020 को शुरू किए गए आंदोलन के दौरान नवम्बर, 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों विवादास्पद कृषि कानून वापस लेने की घोषणा कर दी थी। इसके बाद किसानों ने 11 दिसम्बर, 2021 को अपना आंदोलन वापस ले लिया था। परंतु किसान संगठनों के साथ सरकार ने जो वायदे किए थे, उन्हें पूरा नहीं किए जाने के कारण किसानों ने फिर से दिल्ली कूच करने की घोषणा कर दी और अब किसानों के आंदोलन के दूसरे चरण में पंजाब और हरियाणा के बीच शंभू बार्डर पर गत 13 फरवरी से जारी है। धरने के 31 अगस्त को 200 दिन पूरे हो जाएंगे। इस दौरान समय-समय पर कुछ नेताओं द्वारा आपत्तिजनक बयान देकर वातावरण खराब करने की कोशिशें भी जारी हैं। 12 अगस्त को पिछली सुनवाई में सुप्रीमकोर्ट ने पंजाब और हरियाणा की सरकारों को आंशिक रूप से बार्डर खोलने का निर्देश देते हुए कहा था कि वे शंभू बार्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों को सडक़ से ट्रैक्टर और ट्रालियां हटाने के लिए राजी करें। सुप्रीमकोर्ट के उक्त आदेश के बावजूद 21 अगस्त तथा 25 अगस्त को पटियाला में पंजाब पुलिस, किसानों और हरियाणा के वरिष्ठ अधिकारियों की हुई बैठकें बेनतीजा रहने के कारण बार्डर का खुलना फिलहाल टल गया है। दूसरी ओर किसान नेताओं ने 31 अगस्त को शंभू बार्डर सहित तीन स्थानों पर किए जाने वाले प्रदर्शनों की रणनीति भी बना ली है। जानकारी के अनुसार शंभू बार्डर पर धरने के दौरान अब तक 26 किसानों की मौत हो चुकी है। किसानों का आंदोलन जारी रहने से न सिर्फ उनकी ऊर्जा व्यर्थ में नष्ट हो रही है, बल्कि अपने जिस समय का सदुपयोग वे खेतों में कर सकते थे। वह धरना-प्रदर्शन की भेंट चढ़ रहा है। यही नहीं, धरना-प्रदर्शन के कारण क्षेत्रवासियों को भी भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है और सरकार की प्रतिष्ठा पर भी आंच आ रही है। अत: इस समस्या को यथाशीघ्र सुलझाने में ही सभी पक्षों का हित है। अब जबकि इसी वर्ष हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने जा रहे हैं, यदि सरकार किसानों की भी सुन ले तो उसे इसका लाभ पहुंच सकता है।

