भारत में जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण मिट्टी का क्षरण बढ़ता जा रहा है। जहां मिट्टी का कटाव प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहा है, जिससे सभी प्रकार के जीवों के लिए जल का रिसाव और उपलब्धता कम हो रही है और भोजन में विटामिन और पोषक तत्वों का स्तर कम हो रहा है। स्वस्थ मिट्टी के बारे में जागरूकता बढ़ाने, मृदा संसाधनों के स्थायी प्रबंधन की पैरवी करने और मृदा क्षरण से निपटने के लिए आज विश्व मृदा दिवस मनाया जाएगा। टिकाऊ मृदा प्रबंधन पद्धतियां, कटाव और प्रदूषण को कम करती हैं और जल-रिसाव और भंडारण को बढ़ाती हैं। ये मृदा जैव विविधता का संरक्षण भी करती हैं, उर्वरता में सुधार करती हैं और कार्बन अवशोषण में योगदान देती हैं। जो जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस दिन की शुरुआत वर्ष,2002 में अंतरराष्ट्रीय मृदा विज्ञान संघ की ओर से की गई थी, जिसे बाद में थाईलैंड के दिवंगत राजा भूमिबोल अदुल्यादेज के योगदान को सम्मानित करने के लिए वर्ष,2014 में संयुक्त राष्ट्र की ओर से आधिकारिक मान्यता दी गई। जहां 95 फीसदी से अधिक भोजन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी से आता है, इसलिए स्वस्थ मिट्टी खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
यह पृथ्वी पर जीवन के लिए एक मूलभूत संसाधन है और स्वस्थ मिट्टी पारिस्थितिक तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है। स्वस्थ मिट्टी का प्रबंधन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और जल संसाधनों की रक्षा करने में मदद कर सकता है। इस वर्ष का विषय भी स्वस्थ शहरों के लिए स्वस्थ मृदा है और यह विषय शहरी परिदृश्यों पर केंद्रित है। डामर, इमारतों और सडक़ों के नीचे मिट्टी होती है, जो अगर पारगम्य हो और उसमें वनस्पति हो, तो वर्षा जल को सोखने, तापमान को नियंत्रित करने, कार्बन को संग्रहित करने और वायु की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करती है। पर जब इसे सीमेंट से सील कर दिया जाता है, तो यह इन कार्यों को खो देती है, जिससे शहर बाढ़, अत्यधिक गर्मी और प्रदूषण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इसलिए यह दिन नीति निर्माताओं से लेकर नागरिकों तक सभी को शहरी स्थानों पर जमीनी स्तर से पुनर्विचार करने, हरित, अधिक लचीले और स्वस्थ शहरों का निर्माण करने के लिए प्रेरित करता है।

