देश में खाद्य वस्तुओं के बेतहाशा बढ़ती कीमतों की वजह से अक्टूबर महीने में खुदरा महंगाई की दर बढक़र 6.2 प्रतिशत हो चुकी है, जो कि पिछले 14 महीनों में सबसे ऊंची है। चालू वित्त वर्ष में महंगाई की दर 4.2 प्रतिशत के आसपास रहेगी। उससे यह दर दो प्रतिशत अधिक है। महंगाई फलों, सब्जियों व मीट-मछली और खाने के तेल के दाम मुख्यत: बढऩे की वजह से ऊंची ही है। बढ़ती महंगाई का सबसे ज्यादा विपरीत असर मध्यम व गरीब तबकों पर पड़ रहा है। सबसे ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि खाद्य वस्तुओं के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है जिससे इसका खुदरा महंगाई सूचकांक बढक़र 10.87 प्रतिशत हो गया है जो कि पिछले 15 महीनों में सर्वाधिक है। हालांकि यह सितम्बर महीने में भी 9.24 प्रतिशत था। इसकी एक वजह यह भी मानी जा रही है कि अक्टूबर महीने में त्यौहारों जैसे दीपावली व दशहरा और विजयदशमी का मौसम था, अत: खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़े हैं। त्यौहारी मौसम में इन वस्तुओं की मांग बहुत अधिक बढ़ जाती है। मगर पिछले वर्ष के इसी महीने को देखें तो यह दर केवल 6.61 प्रतिशत थी। इससे पता चलता है कि चालू वित्त वर्ष में महंगाई की रफ्तार बहुत तेज भाग रही है। परन्तु चालू वर्ष के विगत सितम्बर महीने में औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में वृद्धि हुई है। जबकि इससे पिछले महीने अगस्त महीने में औद्योगिक उत्पादन की दर नकारात्मक थी और इसमें .1 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई थी। इसकी वजह भी त्यौहारी मौसम माना जा रहा है क्योंकि त्यौहार के अवसर पर इस क्षेत्र में भी उत्पादन बढ़ता है, जिससे त्यौहारों पर बढ़ी मांग की पूर्ति समुचित रूप से की जा सके। परन्तु खाद्य मोर्चे पर बढ़ती महंगाई चिन्ता बढ़ाने वाली बात है क्योंकि अक्टूबर महीने में इसकी दर दहाई के आंकड़े से पार हो गई जो कि पिछले 14 महीने में सर्वाधिक है। जुलाई 2023 के बाद इस प्रकार की बेतहाशा वृद्धि पहली बार दर्ज की गई है। सबसे ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि यदि इसी प्रकार महंगाई बढ़ती रही तो आने वाले महीनों में इसमें कमी के आसार नहीं रहेंगे क्योंकि प्राय: यह होता है कि खाद्य वस्तुओं के दामों में जब एक बार वृद्धि हो जाती है तो उनके दाम नीचे आने का नाम नहीं लेते। इसमें सबसे ज्यादा परेशानी गरीब आदमियों विशेषकर रोज मजदूरी करने वाले लोगों को होती है क्योंकि उनकी मजदूरी आम तौर पर बढ़ती नहीं है। नौकरी पेशा मध्यम वर्ग के लोगों पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ता है क्योंकि उनकी आमदनी भी निश्चित होती है। भारत में प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े भी चिन्तित करने वाले माने जाते हैं, क्योंकि देश की सम्पत्ति पर केवल दस प्रतिशत लोग ही अधिकार जमाये बैठे हैं। इनमें भी एक प्रतिशत लोगों के पास मुल्क की 44 प्रतिशत सम्पत्ति है।

