हर साल की भांति इस वर्ष भी आज वैश्विक स्तर पर विश्व सुनामी जागरूकता दिवस मनाया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य सुनामी जैसी विनाशकारी प्राकृतिक आपदा के प्रति आम जनमानस को जागरूक करना और इससे निपटने की अंतरराष्ट्रीय तैयारियों को और अधिक मजबूत करना है। दिसंबर, 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस दिवस को मनाने की आधिकारिक घोषणा की थी, ताकि भविष्य में तटीय क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को इस प्रलयकारी आपदा के कहर से बचाया जा सके और जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके। सुनामी का इतिहास मानव सभ्यता के लिए बेहद खौफनाक और पीड़ादायक रहा है। 26 दिसंबर, 2004 को हिंद महासागर में आई सुनामी आज भी दुनिया के इतिहास की सबसे दर्दनाक त्रासदियों में गिनी जाती है। तब समुद्र के भीतर आए भीषण भूकंप के कारण उठी विशालकाय लहरों ने भारत, इंडोनेशिया और श्रीलंका सहित 14 देशों में भारी तबाही मचाई थी। इस आपदा में करीब 2.3 लाख से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी। इसी तरह 2011 में जापान की सुनामी ने भारी विनाश के साथ-साथ फुकुशिमा परमाणु आपदा को जन्म दिया था। सुनामी की लहरें जब तटों से टकराती हैं, तो वे पल भर में आशियानों, उद्योगों और बुनियादी ढांचों को नेस्तनाबूद कर देती हैं। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और प्रभावित क्षेत्र का विकास दशकों पीछे खिसक जाता है। हालांकि सुनामी को रोकना एक मात्र मनुष्य के वश में नहीं है, सामूहिक जिम्मेदारी से ही इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। भारत ने 2004 की त्रासदी के बाद हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय समुद्र सूचना सेवा केंद्र में भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी केंद्र स्थापित किया, जो अक्टूबर, 2007 से चौबीसों घंटे कार्यरत है। इसके बावजूद चेतावनी का अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना और उसका समय पर पालन होना जरूरी है। सरकार को चाहिए कि तटीय क्षेत्रों में मजबूत चेतावनी तंत्र, सायरन, मोबाइल अलर्ट और सुरक्षित निकासी मार्ग विकसित करे। समुद्र तटों पर अनियोजित निर्माण रोका जाए, मैंग्रोव वनों और प्राकृतिक तटीय सुरक्षा कवच का संरक्षण किया जाए तथा स्कूलों, गांवों और मछुआरा बस्तियों में नियमित मॉक ड्रिल आयोजित हों।

