Monday, November 2, 2026 |
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भारतीय अर्थव्यवस्था और राजकोषीय घाटा

The Indian Economy and Fiscal Deficit

by Business Remedies
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किसी भी देश की आर्थिक सेहत का आकलन करने के लिए राजकोषीय घाटा एक महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। सरकार की कुल आय और व्यय के बीच का अंतर, उधार को छोडक़र, राजकोषीय घाटा कहलाता है। भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से इसे नियंत्रित करने और अर्थव्यवस्था को वित्तीय रूप से मजबूत बनाने की दिशा में प्रयासरत है। हालांकि, इस दिशा में प्रगति के साथ कुछ नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सरकार कई स्तरों पर प्रयास कर रही है। पहला, कर संग्रह बढ़ाने के लिए कर व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया जा रहा है। जीएसटी के दायरे में अनुपालन बढ़ाने, कर चोरी रोकने और डिजिटल माध्यमों से राजस्व संग्रह को प्रोत्साहित किया जा रहा है। दूसरा अनावश्यक सरकारी खर्चों पर नियंत्रण और सब्सिडी के बेहतर प्रबंधन पर जोर है। तीसरा बुनियादी ढांचे, सडक़, रेलवे और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में पूंजीगत निवेश को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि दीर्घकाल में आर्थिक विकास और रोजगार के अवसर बढ़ें हैं। इसके अलावा गैर-कर राजस्व और सरकारी परिसंपत्तियों के बेहतर उपयोग से आय बढ़ाने की कोशिश भी जारी है। इस दिशा में हुई प्रगति को पूरी तरह निराशाजनक नहीं कहा जा सकता। कर राजस्व में वृद्धि और पूंजीगत व्यय में निरंतर निवेश सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन ब्याज भुगतान का बढ़ता बोझ, सरकारी योजनाओं पर खर्च और विकास संबंधी आवश्यकताएं चुनौती बनी हुई हैं। राजकोषीय घाटा अधिक होने पर सरकार को ज्यादा उधार लेना पड़ता है। इससे ब्याज दरों पर दबाव, निजी निवेश में कमी, महंगाई और भविष्य की पीढिय़ों पर कर्ज का बोझ बढ़ सकता है। वहीं, घाटे में संतुलित कमी से निवेशकों का विश्वास बढ़ता है और आर्थिक स्थिरता मजबूत होती है। इसलिए सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजकोषीय अनुशासन और विकास के बीच संतुलन कायम रखने की है। घाटा कम करने के नाम पर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और रोजगार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के बजट में कटौती उचित नहीं होगी। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार अनुत्पादक खर्च घटाए, राजस्व के नए स्रोत विकसित करे और विकासोन्मुख निवेश जारी रखे। तभी राजकोषीय घाटे में वास्तविक कमी देश की आर्थिक समृद्धि का आधार बन सकेगी।



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