वर्तमान में ऊर्जा की बढ़ती मांग, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता और जलवायु परिवर्तन की चुनौती के बीच हरित हाइड्रोजन भारत के लिए भविष्य की एक महत्वपूर्ण ऊर्जा संभावना बनकर उभरी है। यह ना केवल स्व‘छ ऊर्जा का विकल्प है, बल्कि भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में नई पहचान दिलाने का माध्यम भी बन सकता है। हरित हाइड्रोजन का उत्पादन सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से पानी का विद्युत अपघटन करके किया जाता है। इस प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन बेहद कम होता है। भारत ने जनवरी, 202& में 19,744 करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है। आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में व्यापक विस्तार की उम्मीद है। सरकार का लक्ष्य वर्ष,20&0 तक प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना है। इसके लिए इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, उत्पादन संयंत्रों, भंडारण और परिवहन सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। गुजरात के कांडला, तमिलनाडु के तूतीकोरिन और ओडिशा के पारादीप को हरित हाइड्रोजन हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। राजस्थान सहित कई रा’यों में भी इस दिशा में नीतिगत पहल हो रही है। हरित हाइड्रोजन के अनेक फायदे हैं। इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, वायु प्रदूषण नियंत्रित होगा और पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भरता घटेगी। उर्वरक, इस्पात, रिफाइनरी, भारी परिवहन और जहाजरानी जैसे क्षेत्रों को स्व‘छ ऊर्जा उपलब्ध हो सकेगी। इसके अलावा घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा, विदेशी निवेश, निर्यात के अवसर और लाखों रोजगार पैदा होने की संभावनाएं हैं। वहीं सरकार की ओर से सशक्त नीतिगत प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण और हाइड्रोजन उत्पादन के लिए वित्तीय प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं। अनुसंधान, तकनीकी विकास, कौशल प्रशिक्षण और पायलट परियोजनाओं को भी बढ़ावा मिल रहा है। हरित अमोनिया के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए उर्वरक संयंत्रों के साथ आपूर्ति समझौते किए गए हैं।

