New Delhi,
देश की केंद्रीय बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) आगामी मौद्रिक नीति समिति की बैठक में repo rate को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रख सकता है। एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण आर्थिक वृद्धि और महंगाई पर दबाव बना हुआ है, जिसके चलते फिलहाल दरों में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।
दर कटौती चक्र समाप्त, लंबा विराम संभव
बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट के अनुसार, अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों में कटौती का चरण अब समाप्त हो चुका है और आरबीआई लंबे समय तक विराम की नीति अपना सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल संतुलित रुख बनाए रखेगा और परिस्थितियों पर करीबी नजर रखेगा। साथ ही, तरलता और रुपये को समर्थन देने के लिए लक्षित कदम उठाए जा सकते हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि महंगाई 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा को पार करती है, तो वर्ष के अंत तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है। अगले 3-4 महीनों में युद्ध के प्रभाव से वृद्धि और महंगाई की दिशा स्पष्ट होगी, जिसके बाद आरबीआई आगे का निर्णय लेगा। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है। विशेष रूप से होरमुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। इसका सीधा असर वैश्विक और घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
stock market update: बाजार में अस्थिरता और पूंजी निकासी
युद्ध की स्थिति के चलते वित्तीय बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है। विदेशी निवेशकों द्वारा भारत से पूंजी निकासी बढ़ी है, जिससे बॉन्ड प्रतिफल और भारतीय मुद्रा पर दबाव बना है। रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.83 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध का प्रभाव वैश्विक आर्थिक वृद्धि और महंगाई दोनों पर पड़ेगा, जिसका असर भारत पर भी दिख सकता है। ऐसे में आरबीआई को वित्त वर्ष 2027 के लिए अपनी विकास दर और महंगाई के अनुमान में बदलाव करना पड़ सकता है। मुख्य आर्थिक सलाहकार की ओर से जारी मासिक आर्थिक बुलेटिन में भी चेतावनी दी गई है कि चालू खाता घाटा वित्त वर्ष 2027 में काफी बढ़ सकता है। रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026 के लिए सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है, जबकि वित्त वर्ष 2027 में यह 7 से 7.2 प्रतिशत के बीच रह सकती है।

