मानसून की बारिश नहीं होने से किसानों के माथे में चिंता की लकीरें साफ दिखने लगी है कि आखिरकार कब वे खरीफ फसल की बुआई करेंगे? पहले मौसम विभाग द्वारा पंद्रह जून से बारिश शुरू होने की भविष्यवाणी की गई थी, पर वह गलत साबित हो गई है। ऐसे में किसान भी हाथ पर हाथ धरे बैठे गए हैं। अब अल नीनो और मानसून में देरी के कारण अपर्याप्त मिट्टी की नमी, देर से बुवाई से पौधों के विकास का कम समय और अंकुरण में विफलता जैसी समस्याएं पैदा होने का भय सताने लग गया है। इससे कृषि पैदावार में गिरावट का खतरा होने की उम्मीद है। अपर्याप्त बारिश में जल्दबाजी में की गई बुवाई से बीज अंकुरित नहीं हो पाएंगे। बारिश ना होने से खेत की तैयारी धीमी पड़ जाएगी और मिट्टी में जरूरी नमी का अभाव रह जाएगा। वहीं मानसून में देरी से फसलों की बढ़वार का समय कम हो जाएगा। कृषि वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानसून में देरी होती है, तो खेत में बुवाई के लिए किसान कम से कम 75 से 100 मिमी बारिश होने तक या पर्याप्त नमी आने तक प्रतीक्षा करें। धान या मक्का जैसी अधिक पानी वाली फसलों के बजाय बाजरा, ज्वार, मूंग, उड़द, तिल और अरहर जैसी कम अवधि और कम पानी वाली फसलों की बुवाई करें। इसके अलावा कम अवधि में पकने वाली और सूखा-रोधी बीजों का ही चुनाव करें। जोखिम को कम करने के लिए मुख्य फसल के साथ अंतर-फसलें जैसे अरहर व मूंग लगाएं। उपलब्ध पानी का सही उपयोग करने के लिए ड्रिप विधि अपनाएं और नमी तक बचाने के लिए खेत में मल्चिंग करें।

