मिडिल ईस्ट में तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत की ग्रोथ अब केवल निर्यात पर नहीं, बल्कि बड़े घरेलू बाजार, डिजिटल इकोनॉमी और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश पर आधारित है। भारत की जीडीपी का बड़ा हिस्सा घरेलू खपत से आता है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उपभोग बना हुआ है। आरबीआई और आईएमएफ ने भी इसे भारत की सबसे बड़ी ताकत माना है। वहीं जहां बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली पहले से मजबूत हुई है। एनपीए कम हुए हैं, बैंकों की बैलेंस शीट बेहतर हुई है और डिजिटल पेमेंट्स ने आर्थिक गतिविधि को तेज किया है। इसके अलावा सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश में वृद्धि होना है। हाईवे, रेलवे, डिफेंस, सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग में लगातार पूंजी निवेश हो रहा है। इससे रोजगार और उद्योग दोनों को समर्थन मिल रहा है। वहीं कई वैश्विक कंपनियां चीन को सप्लाई चेन से बाहर कर रही हैं। इससे भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल निर्माण और रक्षा उत्पादन में लाभ मिल रहा है। भारत का आईटी और डिजिटल सेवा निर्यात अभी भी मजबूत विदेशी मुद्रा ला रहा है, जिससे तेल आयात का दबाव कुछ हद तक संतुलित हुआ है। भारत के पास बड़े विदेशी मुद्रा भंडार हैं, जिससे अचानक तेल कीमत बढऩे या डॉलर मजबूत होने पर झटका संभालने की क्षमता बढ़ी है। फिलहाल भारत के समक्ष खतरे भी हैं। भारत अभी भी लगभग 8५-90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। अगर मिडिल ईस्ट संकट लंबा चला और तेल डॉलर १००-११० प्रति बैरल से ऊपर रहा, तो महंगाई और चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है। वैसे अधिकांश वैश्विक एजेंसियों का भी मानना है कि भारत अगले 5 वर्षों तक दुनिया की सबसे तेजी से बढऩे वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में रहेगा। भारत की वार्षिक जीडीपी ग्रोथ करीब ६ से ७ फीसदी के बीच रह सकती है। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है। मैन्युफैक्चरिंग,एआई, डिजिटल सेवाएं, ग्रीन एनर्जी और डिफेंस सेक्टर सबसे बड़े ग्रोथ इंजन बन सकते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था भी बेहतर बने रहने की पूरी उम्मीद है।

