बिजऩेस रेमेडीज/नई दिल्ली भारत की सबसे बड़ी Digital Healtcare Company हेल्थकेयर कंपनी MediBuddy ने एक नया डेटा जारी किया है, जिससे पता चला है कि शहरी कॉरपोरेट एम्प्लॉइज में से करीब 8.1 प्रतिशत को दिल की बीमारी का ज़्यादा खतरा है। इसमें 31-40 साल की उम्र के लोग सबसे ज़्यादा रिस्क पर हैं। यह डेटा अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच 11,779 लोगों (जिनमें 9,404 पुरुष और 2,370 महिलाएं शामिल हैं) की दिल की बीमारी से जुड़े रिस्क और डायग्नोस्टिक रिपोर्ट्स पर आधारित है। इस स्टडी में पाया गया कि 91.9 प्रतिशत शहरी कॉरपोरेट एम्प्लॉइज को दिल की बीमारी का कम खतरा था, जबकि सिर्फ 2.82 प्रतिशत लोग मॉडरेट रिस्क कैटेगरी में थे। इसकी तुलना में, ढ्ढष्टरूक्र की हालिया नेशनल स्टडी में 4,500 वयस्कों में से सिर्फ 84.9 प्रतिशत को कम रिस्क और 14.4 प्रतिशत को मॉडरेट रिस्क था। यह बड़ा अंतर दिखाता है कि कॉरपोरेट सेक्टर में एम्प्लॉई वेलनेस प्रोग्राम्स का कितना सकारात्मक असर हुआ है, खासकर कोविड के बाद अब कंपनियों में सब्सिडी वाले डायग्नोस्टिक टेस्ट, सालाना हेल्थ चेक-अप और कॉम्प्रिहेंसिव मेडिक्लेम पॉलिसीज़ की पहुंच बढऩे से लोग प्रिवेंटिव केयर (बीमारी से बचाव) को ज़्यादा अहमियत दे रहे हैं।
31-40 साल के युवाओं में जल्दी दिख रहे हैं दिल के खतरे के लक्षण : स्टडी के सबसे बड़े गु्रप यानी 31-40 साल की उम्र के लोगों में से 10 प्रतिशत को मॉडरेट या हाई कार्डियक रिस्क (दिल की बीमारी का मध्यम या ज़्यादा खतरा) कैटेगरी में पाया गया, जबकि 41-50 साल के ग्रुप में यह आंकड़ा 8 प्रतिशत था। युवाओं में दिल की बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखना, लाइफस्टाइल, खान-पान और स्ट्रेस से जुड़ी आदतों के दूरगामी प्रभावों पर ध्यान दिलाता है।
शहरी कॉरपोरेट महिलाओं में दिल की बीमारी का खतरा कम हुआ : जेंडर-वाइज़ एनालिसिस में पाया गया कि जिन महिलाओं की स्क्रीनिंग हुई, उनमें से 2.06 प्रतिशत को हाई कार्डियक रिस्क था- यह पूरे देश के ट्रेंड्स के मुकाबले एक अच्छी खबर है। ढ्ढष्टरूक्र की स्टडी के अनुसार, 10 प्रतिशत टेस्ट की गई महिलाओं को कार्डियोवैस्कुलर (दिल और नसें) बीमारी होने का ज़्यादा खतरा था। शहरी कॉरपोरेट महिलाओं में यह कम रिस्क परसेंट दिखाता है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढऩे और एम्प्लॉयर-सपोर्टेड वेलनेस प्रोग्राम्स की वजह से वर्किंग महिलाएं अब अपनी फिजिकल हेल्थ को ज़्यादा गंभीरता से ले रही हैं।मेडीबडी की फाइंडिंग्स में अभी भी ज़्यादातर हाई-रिस्क केस पुरुषों (79.9 प्रतिशत) में हैं, लेकिन महिलाओं की बेहतर होती प्रोफाइल से पता चलता है कि वर्कप्लेस हेल्थ प्रोग्राम्स जेंडर हेल्थ गैप (पुरुषों और महिलाओं के स्वास्थ्य में अंतर) को कम करने में शुरुआती असर दिखा रहे हैं।
शहरी वर्कफोर्स में कोलेस्ट्रॉल की समस्या आम : स्टडी में रूटीन कार्डियक डायग्नोस्टिक टेस्ट के रिजल्ट्स भी देखे गए। इसमें पाया गया कि 45 प्रतिशत लोगों में ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल हाई था, जो दिल की बीमारी का एक चेतावनी संकेत है। इसके अलावा, लगभग 30त्न लोगों में टोटल लिपिड रेशियो (कोलेस्ट्रॉल का संतुलन) गड़बड़ था, और 11 प्रतिशत में LDL (खराब कोलेस्ट्रॉल) का लेवल हाई था।
इन फाइंडिंग्स पर MediBuddy की मेडिकल ऑपरेशंस हेड, डॉ. गौरी कुलकर्णी ने कहा कि युवा और मिडिल-एज प्रोफेशनल्स में कार्डियोवैस्कुलर रिस्क एक ज़रूरी लेकिन अक्सर अंडरडायग्नोस्ड (जिसकी पहचान नहीं हो पाती) समस्या है। डेटा दिखाता है कि रिस्क फैक्टर्स की शुरुआती शुरुआत हमारी सोच से ज़्यादा आम है – खासकर 31-40 साल के गु्रप में। हाई स्ट्रेस, सिडेंटरी लाइफस्टाइल (कम फिजिकल एक्टिविटी), खराब डाइट और प्रिवेंटिव चेक-अप्स की कमी इस ट्रेंड को बढ़ा रही है। अच्छी बात यह है कि शुरुआती हस्तक्षेप से इन्हें मैनेज किया जा सकता है। MediBuddy में हमारा लक्ष्य लोगों को उनके स्वास्थ्य जोखिम को समझने और प्रोएक्टिव कदम उठाने में मदद करना है – चाहे वह क्लिनिकल फॉलो-अप्स, लाइफस्टाइल में बदलाव, या मेडिकल मैनेजमेंट के ज़रिए हो। यह स्टडी रूटीन एम्प्लॉई वेलनेस प्रोग्राम्स में प्रिवेंटिव कार्डियोवैस्कुलर स्क्रीनिंग को शामिल करने की अहमियत पर जोर देती है। लंबे समय में, लाइफस्टाइल एजुकेशन, डाइट संबंधी सलाह और नियमित लिपिड मॉनिटरिंग को प्राथमिकता देने से बीमारी की शुरुआत को कम करने और भारत के शहरी वर्कफोर्स के लिए ओवरऑल क्वालिटी ऑफ लाइफ को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

