पिछले कुछ अरसे से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में होती बढ़ोतरी किसी भी देश की बाह्य आर्थिक मजबूती का महत्वपूर्ण सूचक कहा जा सकता है। जो भारत के लिए अच्छी खबर है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार ऊंचे स्तर पर बना रहना अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। इससे रुपए की स्थिरता, आयात सुरक्षा, विदेशी निवेशकों का विश्वास और आर्थिक संकटों से निपटने की क्षमता बढ़ती है। हालांकि केवल विदेशी मुद्रा भंडार बढऩा ही पर्याप्त नहीं है; निर्यात, निवेश, रोजगार और औद्योगिक उत्पादन में सतत वृद्धि भी दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती के लिए आवश्यक है। यह भंडार मुख्यत: विदेशी मुद्राओं विशेषकर अमेरिकी डॉलर, सोना, आईएमएफ के एसडीआर और आईएमएफ में रिजर्व पोजिशन से मिलकर बनता है। जहां भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 1.08 अरब डॉलर बढक़र 676.24 अरब डॉलर के मजबूत स्तर पर पहुंच गया है। पिछले पांच वर्षों के दौरान भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में औसतन करीब 4 से 6 फीसदी सालाना की यौगिक वृद्धि दर दर्ज की गई है। यह बढ़ा हुआ विदेशी मुद्रा भंडार देश को करीब 11 महीने के जरूरी आयात जैसे कच्चा तेल, कोयला आदि का भुगतान करने की पूरी सुरक्षा प्रदान करता है। भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में डॉलर बेचकर रुपए की कीमत में होने वाले भारी उतार-चढ़ाव को रोक सकता है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार से वैश्विक निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा बढ़ता है। भू-राजनीतिक तनाव या वैश्विक मंदी जैसे संकट के समय यह देश के बाहरी ऋण और भुगतानों को पूरा करने में मददगार साबित होता है।

