भारत देश अपने ७८वें स्वतंत्रता दिवस की दहलीज पर खड़ा है और वातावरण में चारों ओर पुरानी यादों एवं गर्व से भरी हवा भी इठला रही है।15 अगस्त 1947, वो दिन था जब भारत ने ब्रिटिश शासन से आजादी हासिल की। देश ने स्वतंत्रता की नई सुबह देखी। ये दिन हमें हमारे वीर स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की याद दिलाता है। उन्हीं की बदोलत हम आज एक आजाद देश में सांस ले पा रहे हैं। इन बीते ७७ सालों में बहुत कुछ बदल गया है। गुलामी के जख्मों से उभरती हुई देश की छवि वैश्विक मंच पर नई ताकत के साथ चमक रही है। फिर भी जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान इतिहास के पन्नों में फीका पड़ता जा रहा है। देश को गुलामी की बेडिय़ों से आजाद करवाने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने जमकर संघर्ष किया था, लेकिन अब यह संघर्ष हमारे बच्चों के जीवन में केवल एक फुटनोट बनकर रह गया है। देशभक्ति और बलिदान की कहानियां, जो कभी एक राष्ट्र को प्रेरित करती थीं, अब एक भूले हुए अतीत का अवशेष बनती जा रही हैं, जो बेहद चिंताजनक है। जहां स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियां अपनेपन की भावनाओं को बढ़ावा देती है। हमें याद दिलाती है कि जिस आजादी को हम अक्सर हल्के में लेते हैं, वह बड़ी मुश्किल से हासिल की गई है। यह हमें एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारियों पर विचार करने के लिए मजबूर करती है। इस स्वतंत्रता दिवस पर हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को अपने घरों में, परिवार में जीवित रखने का संकल्प लें। यह सुनिश्चित करें कि अतीत की छाया हमारे भविष्य का मार्ग रोशन करें। अपने इतिहास को समझने और उसका सम्मान करने के लिए हम कल के वास्तुकारों यानी अपने बच्चों को एक ऐसा राष्ट्र का निर्माण करने के लिए सशक्त बनाएं जो हर विपरीत परिस्थिति में खड़ा रहे। विविधता में एकजुटता का परिचय देने के साथ ही न्याय और समानता में कोई भेदभाव ना करें। तभी हम देश को आजादी दिलाने के लिए कुर्बान होने वाले सेनानियों के नव भारत के सपने को साकार कर सकते हैं।

